: पौराणिक मंदिर दंत धावन कुंड में धूमधाम से मनाया गया गुरुपूर्णिमा महोत्सव
Wed, Jul 13, 2022
पूज्य महंत नारायणाचारी जी महाराज का विधिवत पूजन अर्चन किया महंत विवेकाचारी ने
हजारों शिष्य परिकरों ने निवेदित की अपनी श्रद्धा
अयोध्या। गुरु पूर्णिमा के मौके पर लाखों की संख्या में अयोध्या पहुंचे श्रद्धालुओं ने सरयू में स्नान के बाद राम जन्मभूमि हनुमानगढ़ी सहित प्रमुख मंदिरों में पूजन अर्चन किया इसके बाद सभी भक्त अपने गुरुओं की आराधना की। गुरु पूर्णिमा हिंदू धर्म की प्राचीन परंपरा है जिस का निर्वाह आज भी लोग अपने गुरुओं के दर्शन पूजन और सेवा कर करते हैं। रामनगरी के सबसे प्रचीनतम पौराणिक मंदिर दंत धावन कुंड के पीठाधीश्वर महंत विवेकाचारी जी महाराज के संयोजन में बड़े ही श्रद्धा भाव से गुरु पूर्णिमा मनाया गया। महोत्सव से दूर दराज से हजारों भक्तों ने अपनी हाजिरी लगाई। महंत विवेकाचारी जी महाराज ने कहा कि आज गुरु पूर्णिमा के मौके पर व्यास की पूजा और व्यास की तिथि है आज शिष्य अपने गुरु की पूजा करते हैं और गुरु से आशीर्वाद लेते हैं। महंत विवेकाचारी जी ने कहा कि जब मंत्र की सृष्टि गुरु शिष्य के हृदय में स्थापित करता है तब उसका स्वरूप ब्रह्मा का होता है पालन पोषण और विस्तार को लेकर जब ज्ञान देता तो गुरु का स्वरूप विष्णु का होता है और जब गुरु सभी शक्ति शिष्य को प्राप्त कराने के लिए इज्जत करता है तो सिर्फ उसका शुरू पारब्रह्म परमेश्वर का हो जाता है उन्होंने कहा कि धार्मिक मान्यता है कि गुरु की बात मानने वाले शिष्य को उसकी मुक्ति को संशय नहीं रहता आज के दिन गुरु पूर्णिमा है जो गुरु के लिए है लोग आश्रम में जा कर के अपने गुरुओं की पूजा करते हैं गुरु की महत्वता और कृपा आप पूर्ण रुप से शिष्य को मिली और शिष्य का कल्याण हो इसलिए गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है।
: गुरुपूर्णिमा के मौके पर रामनगरी में पूरी भव्यता से बयां हुई गुरुमहिमा
Wed, Jul 13, 2022
राम नगरी के चुहुओर रहा उल्लास,मेले जैसे महौल में घर्मनगरी पटी भक्तों से
अयोध्या-फैजाबाद। गुरूपूर्णिमा पर्व पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं भक्तों ने पावन सलिला सरय में डुबकी लगायी एवं अपने आराध्य के दरबार में माथा टेका तथा पूजन अर्चन किया। गुरूपूर्णिमा पर्व पर अपने गुरू के प्रति श्रद्धा निवेदित करने एवं दर्शन पूजन के उद्देश्य से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ रामनगरी अयोध्या में उमड़ी। गुरूपूर्णिमा पर्व को देखते हुये प्रशासन द्वारा रामनगरी में सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किये गये थे। जगह-जगह पुलिस बल की तैनाती रही तथा चार पहिया वाहनों का प्रवेश भी प्रतिबंधित रहा।इससे पूर्व ब्रह्ममुहूर्त से ही उमड़े बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं भक्तों ने सरयू स्नान कर विभिन्न मंदिरों में दर्शन पूजन किया।बाईपास स्थित कामधेनु मंदिर में महामंडलेश्वर महंत आशुतोष दास की देख रेख में गुरू पूर्णिमा मनाया गया। महंत आशुतोष दास ने अपने गुरु की पूजा कर आरती उतारी। महंत आशुतोष दास कहते है कि हमारी संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा विष्णु तथा महेश से भी अधिक महत्व दिया गया है, परंतु गुरु अपने को ऐसा नहीं मानता। वह केवल शिष्य की श्रद्धा में अतिविशिष्ट है, क्योंकि स्वयं को सर्वोच्च मानने पर गुरु स्वयं अहंकार द्वारा पतन की ओर उन्मुख हो सकता है। गुरु का कार्य शिष्य को अध्यात्म की ओर प्रेरित करना है।
: भक्तिभाव का आधार प्रेम, श्रद्धा और समर्पण
Fri, Jul 8, 2022
द्वारिकाधीश मंदिर में चल रहे श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण कथा का हुआ समापन
अयोध्या। ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखें। हर हाल में संतुष्ट रहें। भगवान का भक्त हमेशा साहसी, शांत और निर्भय रहता है। भगवान के सामने किसी तरह की शर्त नहीं रखनी चाहिए। निस्वार्थ भाव से की गई पूजा ही श्रेष्ठ मानी जाती है। जीवन में जो भी कुछ मिल रहा है, उसे भगवान का प्रसाद, आशीर्वाद मानकर स्वीकार करना चाहिए और संतुष्ट रहना चाहिए। यही जीवन में सुख और शांति बनाए रखने का मूल मंत्र है। उक्त बातें श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण कथा के समापन दिवस में जगद्गुरू रत्नेशप्रपन्नाचार्य महाराज ने कही। आज रामनगरी अयोध्या के राजघाट स्थित द्वारिकाधीश मंदिर में 9 दिनों से चल रहे कथा का समारोह पूर्वक समापन हुआ। कथा के समापन दिवस पर व्यासपीठ से कथा कहतें हुए जगद्गुरू रत्नेशप्रपन्नाचार्य जी ने कहा कि निःस्वार्थ सेवा, निरंतर महान कार्य और उन कार्यों की क्रियाओं को पूर्ण समर्पण भाव से भगवान के प्रति आत्मसमर्पण कर एक साधक दिव्य कृपा प्राप्त करने के लिए उपयुक्त बनता है ! जब तक भगवान के चरणों में आत्मसमर्पण नहीं होगा तब तक भक्ति का उदय नहीं होगा।जीवन में धर्म व ईश्वर के प्रति समर्पण भाव होना अति आवश्यक है। धर्म व ईश्वर से जुड़े रहकर ही मानव उन्नति की ओर अग्रसर हो सकता है। मानव जीवन में जो व्यक्ति धर्म व ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण रखता है, जो अपना सर्वस्व भगवान को अर्पित कर देता है, उसकी रक्षा के लिए ईश्वर स्वयं तत्पर रहते हैं। उन्होंने कहा कि भक्तों का भगवान के प्रति समर्पण और प्रेम भाव ही ईश्वर भक्ति का दिव्य स्वरूप है। भक्तिभाव का आधार प्रेम, श्रद्धा और समर्पण है। जब भक्त की कामना या प्रार्थना ईश्वर को समर्पित हो जाये तो समझना सच्ची भक्ति है। जो भक्त हृदय से भगवान का स्मरण करता है, ईश्वर भी स्वयं को उसके अधीन कर देते हैं। इसलिए कहा गया है कि सच्ची भक्ति से भगवान भी भक्त के वश में हो जाते हैं। जगद्गुरू जी ने कहा कि भक्तिभाव का आधार प्रेम, श्रद्धा और समर्पण है। भगवान श्रीराम ने शबरी के जूठे बेर भी प्रेम और भक्तिभाव के कारण खाए। मन में भक्ति भाव के उठने के बाद भक्त के व्यक्तित्व के नकारात्मक गुण दूर हो जाते हैं और उसके व्यक्तित्व में निखार आने लगता हैं। इस प्रकार भक्त अपने अहंकार से मुक्त हो जाता है और उसकी आंतरिक चेतना में ईश्वर की अनुभूति होने लगती है।इस मौके पर जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य जी ,डॉ० सुनीता शास्त्री, जगद्गुरू रामानुजाचार्य स्वामी सूर्य नारायणाचार्य जी,स्वामी शशिधराचार्य जी,स्वामी अनिरुद्धाचार्य करतलिया बाबा सहित बड़ी संख्या में संत साधक मौजूद रहें।