: भक्ति, श्रद्धा, समर्पण और प्रेम का प्रतीक बना झुनझुनिया बाबा आश्रम
Sat, Jul 30, 2022
पुण्यतिथि विशेष
झुनझनियां बाबा राम नाम के अनन्य उपासक थे, अपनी भक्ति श्रद्धा और भावना से परमात्मा को सखी रूप से करते थे आराधना
दो दशक से आश्रम को सर्वोच्च शिखर पर स्थापित किया श्रीमहंत करूणा निधान शरण जी महाराज ने
अयोध्या। मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम की धराधाम को सन्तो की सराह भी कही जाती है। या हम यूं कह ले कि रामनगरी में अनेक भजनानन्दी सन्त हुये उनमें से एक रहे विभूषित जगदगुरू स्वामी श्री जानकी शरण झुनझुनिया बाबा जो रामनाम के सच्चे साधक के रूप में न सिर्फ अयोध्या अपितु पूरे भारत में रामनाम की अलख जगायी।
झुनझुनिया बाबा का नाम अयोध्या के सिद्ध संतों में शामिल है। बाबा को सीता जी की सखी चंद्रकला का अवतार कहा जाता है। यही वजह थी कि बाबा हमेशा स्त्री रूप में रहते थे और राम धुन में लीन रहते थे। रसिक भाव से श्रीराम नाम का प्रचार कर उसे जनमानस के हृदय में प्रतिष्ठित करने वाले स्वामी जानकी शरण महाराज उर्फ झुनझुनिया बाबा की गिनती अयोध्या के सिद्ध संतों की अग्रणी पंक्ति में की जाती है। महाराजश्री को सीता जी की सहेली चंद्रकला का अवतार माना जाता है। उन्होंने सरयू के तट पर जहां तपस्या की थी। वहां सियाराम किला भव्य मंदिर बना हुआ है।
सरयूतट पर सुशोभित श्री सियाराम किला झुनकी घाट के आचार्य श्री की तपोस्थली आज अपने सर्वोच्च शिखर की ओर अ्रग्रसर है। यह आश्रम मां सरयू के पावन तट पर स्थित है। जो चतुर्दिक धर्म की स्थापना, समाज सेवा गौ सेवा अतिथि सेवा विद्यार्थी सेवा संत सेवा व दरिद्र नारायण की सेवा में भी दिन प्रतिदिन निरंतर आगे बढ़ रहा है। जहां पर पूरी निष्ठा व ईमान से सभी सेवा किया जा रहा है। इस आश्रम में भक्तों की एक लम्बी फेरहिस्त है। जिसमें पूरे भारत से लाखों भक्त इस आश्रम से जुड़े हुये है। श्री सियाराम किला को भक्ति श्रद्धा समर्पण और प्रेम का प्रतीक भी माना जाता है। मां सरयू के तट पर भव्य और आकर्षक श्री सियाराम किला झुनकीघाट भक्ति और साधना के दृष्टि से भी सर्वोत्तम स्थान माना जाता है। यहां पहुंचकर सन्त साधक अपने परमाराध्य प्रभु की आराधना कर अपने को कृत्य-कृत्य करते है। मन्दिर के जगमोहन में युगल सरकार की प्रतिमा संगमरमर से बनी दिव्य मूर्ति का दर्शन करते है। मन्दिर में लगातार आज भी सीताराम धुनि कीर्तन संपदितकर महौल को भक्मिय बना देता है। कहते है सौन्दर्यशाली, शांत वातावरण सरयूतट साकेत लोक का अनुभव सदा सर्वदा शीतल मंद सुगंध समीर अनुपम सूर्यास्त दर्शन भजनांदियो के लिए उत्तम शोर से परमशांत गुफा किला से सरयू तक जाने का गुप्त मार्ग झुनकी उद्यान मिथिला वाटिका सत्ंसग भवन श्री युगल बिहारी जू का अद्भुत दर्शन जैसी भाव-भंगिमा रखे ठाकुर जी वैसा ही बन जाए आदि सियाराम किला का विशिष्ठ गुण हे। स्वामी जानकी शरण उर्फ झुनझुनिया बाबा उल्टी खाट पर बैठकर श्री राम नाम सत्य है की धुन लगाते हुए यात्रा करते थे। झुनझुनिया बाबा कानों में बाली हाथों में कंगन पैरों में घुंघरू पहन के सीता जी की सखी चंद्रकला के रूप में ही आजीवन भगवान श्रीराम की आराधना में लीन रहे। उन्होंने सत्यभाव से श्री सीताराम की उपासना की धारा प्रज्वलित की, जो आज भी करोड़ों लोगों को रामनाम रूपी दिव्य रस का अनुभव कराती है. मंदिर के महंत करुणानिधान शरण महाराज कहते हैं की झुनझुनियां बाबा ने कई दशक तक कठोर तपस्या कर भगवान का साक्षात दर्शन प्राप्त किया। किशोरी जी से उन्हें जन कल्याण का आदेश मिला।
सिद्ध संत और श्री राम नाम के अनन्य उपासक अपनी भक्ति श्रद्धा और भावना से परमात्मा को सखी रूप से आराधना कर प्रसन्न करने वाले जगद्गुरु द्वाराचार्य अनंत श्री समलंकृत श्री जानकी शरण जी महाराज झुनझनियां बाबा जी की 27 वीं पुण्यतिथि पर आज चरण पादुका पूजन एवं अभिषेक के साथ धूमधाम से सिद्ध पीठ श्री सियाराम किला झुनकी घाट में मनाया जायेगा। इस आश्रम को दो दशक से अपने सर्वोच्चत शिखर पर निरन्तर ले जाने के लिए आज भी वर्तमान महन्त श्री करूणा निधानशरण जी महराज लगे रहते हे। आश्रम से जुड़े प्रख्यात कथावाचक जिनका नाम देश विदेश के नामचीन कथावाचकों में लिया जाता है। परमश्रेद्धय स्वामीजी प्रंभजनानन्द शरण जी महराज प्रभुवन्दन एवं जनसेवा संस्थान द्वारा निरन्तर दीन-दुखी असहाय की मदद करना चिकित्सालयों की स्थापना कर रोगियों को निःशुल्क उपचार करना वृद्धजनों व वृद्धा आश्रम असहाय व निर्धन कन्याओं का विवाह करना विशाल गौशाला प्राकृतिक प्रकोप यानि बाढ़ भूकप में राहत देना सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार करना जैसी तमाम योजनाएं चला कर निरन्तर लोगों की मदद करते चले आ रहे है। आश्रम में सभी उत्सव बड़े ही श्रद्धा भाव के साथ मनाया जाता है।
: गुरूदेव अप्रतिम प्रतिभा के धनी संत थे: विद्याभास्कर
Sat, Jul 30, 2022
काेशलेश सदन के संस्थापक आचार्य स्वामी रामनारायणाचार्य महाराज के 37 वीं पुण्यतिथि पर संतों ने किया नमन
अयाेध्या। काेशलेश सदन के संस्थापक आचार्य स्वामी रामनारायणाचार्य महाराज काे संताें ने श्रद्धापूर्वक याद किया। माैका था उनके 37 वें पुण्यतिथि महाेत्सव का। इस अवसर पर शनिवार को मंदिर प्रांगण में श्रद्धांजलि सभा का आयाेजन किया गया जिसमें रामनगरी के विशिष्ट संत-महंत और धर्माचार्याें ने पूर्वाचार्य की प्रतिमा पुष्पांजलि अर्पित कर नमन किया। संताें ने संस्थापक आचार्य के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर प्रकाश भी डाला। काेशलेश सदन के वर्तमान पीठाधीश्वर जगद्गुरू स्वामी वासुदेवाचार्य विद्याभास्कर महाराज ने कहा कि उनके गुरूदेव अप्रतिम प्रतिभा के धनी संत थे। उनकी गणना सिद्ध संताें में हाेती रही है। उनका व्यक्तित्व बड़ा ही उदार था। रामनगरी के सभी संत-महंत उनका आदरपूर्वक सम्मान करते थे। अपने जीवनकाल में उन्होंने आश्रम का सर्वांगीण विकास किया। जीवन पर्यंत मठ के उत्तराेत्तर समृद्धि में लगे रहे। आज उन्हीं की देन है कि आश्रम अयाेघ्यानगरी के प्रमुखतम पीठाें में से एक है। जहां गाै, संत, विद्यार्थी व आगंतुक सेवा सुचार रूप से चल रही है।
इस माैके पर मणिरामदास छावनी उत्तराधिकारी महंत कमलनयन दास, लक्ष्मणकिलाधीश महंत मैथिलीरमण शरण, उत्तर ताेताद्रिमठ जगद्गुरु स्वामी अनंताचार्य, जगद्गुरु स्वामी रामदिनेशाचार्य, गाेपाल मंडपम महंत स्वामी कूरेशाचार्य, रसिक पीठाधीश्वर महंत जन्मेजय शरण, बड़ाभक्तमाल महंत अवधेश दास, श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट महासचिव चंपत राय व ट्रस्टी डा. अनिल मिश्रा, हनुमत निवास महंत डॉ. मिथिलेश नंदिनी शरण, मंगलभवन पीठाधीश्वर महंत रामभूषण दास कृपालु, वेद मंदिर महंत रामनरेश दास, श्रीरामाश्रम महंत जयराम दास, महंत राजूदास, महंत रामकुमार दास, महंत हरिसिद्धि शरण, महंत शशिकांत दास, महंत कमलादास रामायणी, महंत रामनरेश शरण, महंत संताेष दास, महंत तुलसीदास, पार्षद पुजारी रमेश दास, प्रियेश दास आदि संत-महंत व भक्तगण उपस्थित रहे।
: हमारी श्वांस-प्रश्वांस आराध्य के साथ धड़कती है: महंत रामशरण दास
Mon, Jul 25, 2022
रंग महल में झूले पर विराजे अवधविहारी-विहारिणी को पुष्पों एवं पुष्पलड़ियों से इस कदर आच्छादित किया गया कि फूल-बंगला बन गया
झूलन के लिए बनवाया गया साठ किलो चांदी का झूला
शुक्ल पक्ष की एकादशी को होगी गलबहियां की झांकी
बमबम यादव
अयोध्या। रामनगरी अयोध्या में मधुर उपासना परंपरा की शीर्ष पीठ श्रीरंगमहल में बीती शाम झूलनोत्सव का चरम परिभाषित हुआ। झूले पर विराजे अवधविहारी-विहारिणी को पुष्पों एवं पुष्पलड़ियों से इस कदर आच्छादित किया गया कि फूल-बंगला बन गया। भक्ति में पगे संतों के बीच फूल-बंगला में आराध्य को सजाने की परंपरा पुरानी है और रंगमहल में इस परंपरा पर अमल के साथ आराध्य के सम्मुख संगीत की महफिल सजाई गई। इस दौरान मंदिर के संस्थापक एवं रसिक संत पूज्य सरयूशरण महाराज सहित कुछ अन्य दिग्गज आचार्यों के पदों की प्रस्तुति से भक्ति, अध्यात्म एवं संस्कृति की प्रवाहित त्रिवेणी आकर्षण के केंद्र में रही और इस सलिला में डुबकी लगाने वालों में मणिरामदास जी की छावनी के उत्ताराधिकारी महंत कमलनयन दास आचार्य पीठ दशरथमहल बड़ास्थान पीठाधीश्वर बिदुगाद्याचार्य देवेंद्रप्रसादाचार्य, जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य, बावन जी मंदिर के वैदेही बल्लभ शरण, नाका हनुमानगढ़ी के महंत रामदास आदि सहित रामनगरी के संत शामिल रहे। उत्सव की अध्यक्षता रंगमहल के महंत रामशरणदास ने किया। उन्होंने संतों का स्वागत करने के साथ आभारपूर्वक विदाई दी। रात्रि आठ बजे से शुरू संगीत संध्या मध्यरात्रि शयन आरती के साथ समाप्त हुई।
रंगमहल में आचार्य परम्परा में परम्परागत रीति से ही उत्सव मनाया जाता है। यही नहीं आचार्यों की ओर से प्रयुक्त होने वाले उपकरणों का भी प्रयोग होता रहा है। इसी कड़ी में झूलन के लिए ढ़ाई सौ साल पुराने लकड़ी के झूले का प्रयोग हो रहा था। मंदिर महंत रामशरण दास ने बताया कि परमात्मा की इच्छा से उसी लकड़ी पर चांदी का वर्क चढ़ाकर इस साल भगवान को उसी झूले पर प्रतिष्ठित किया गया है। झूले के निर्माण में साठ किलो चांदी का इस्तेमाल हुआ है। यहां चल रहे झूलनोत्सव की कड़ी में सावन तीज यानि की 31 जुलाई को मणिपर्वत के झूलन उत्सव के लिए भी ठाकुरजी को शोभायात्रा के रुप में धूमधाम से ले जाया जाएगा।
रंगमहल की आचार्य परम्परा में सावन शुक्ल पक्ष की एकादशी को गलबहियां की झांकी सजाए जाने की प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है। मंदिर के पीठाधीश्वर महंत रामशरण दास महाराज ने बताया कि वाह्य जगत के लिए यह एक सांस्कृतिक उत्सव है लेकिन साधकों की दृष्टि से यह उपासना परम्परा है जो तत् सुखी सुखित्व की भावना से प्रेरित है जिसमें साधक आराध्य के सुख में ही सुख और आऩद की अनुभूति कर निरन्तर उन्हीं के चिंतन-मनन में व्यस्त रहते है जैसे कि एक मां अपने नन्हें बच्चे की चिंता करते हुए अपने सभी क्रियाकलाप को उसी के लिए समर्पित कर देती है। कार्यक्रम की देखरेख पुजारी साकेत जी व राहुल जी कर रहे है।