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संतों के सान्निध्य में वैष्णव परंपरा के अनुसार विधिवत अनुष्ठान कर अमित कुमार दास को कंठी, चादर और तिलक देकर महंत पद की

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: भक्तिभाव का आधार प्रेम, श्रद्धा और समर्पण

बमबम यादव

Fri, Jul 8, 2022

द्वारिकाधीश मंदिर में चल रहे श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण कथा का हुआ समापन

अयोध्या। ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखें। हर हाल में संतुष्ट रहें। भगवान का भक्त हमेशा साहसी, शांत और निर्भय रहता है। भगवान के सामने किसी तरह की शर्त नहीं रखनी चाहिए। निस्वार्थ भाव से की गई पूजा ही श्रेष्ठ मानी जाती है। जीवन में जो भी कुछ मिल रहा है, उसे भगवान का प्रसाद, आशीर्वाद मानकर स्वीकार करना चाहिए और संतुष्ट रहना चाहिए। यही जीवन में सुख और शांति बनाए रखने का मूल मंत्र है। उक्त बातें श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण कथा के समापन दिवस में जगद्गुरू रत्नेशप्रपन्नाचार्य महाराज ने कही। आज रामनगरी अयोध्या के राजघाट स्थित द्वारिकाधीश मंदिर में 9 दिनों से चल रहे कथा का समारोह पूर्वक समापन हुआ। कथा के समापन दिवस पर व्यासपीठ से कथा कहतें हुए जगद्गुरू रत्नेशप्रपन्नाचार्य जी ने कहा कि निःस्वार्थ सेवा, निरंतर महान कार्य और उन कार्यों की क्रियाओं को पूर्ण समर्पण भाव से भगवान के प्रति आत्मसमर्पण कर एक साधक दिव्य कृपा प्राप्त करने के लिए उपयुक्त बनता है ! जब तक भगवान के चरणों में आत्मसमर्पण नहीं होगा तब तक भक्ति का उदय नहीं होगा।जीवन में धर्म व ईश्वर के प्रति समर्पण भाव होना अति आवश्यक है। धर्म व ईश्वर से जुड़े रहकर ही मानव उन्नति की ओर अग्रसर हो सकता है। मानव जीवन में जो व्यक्ति धर्म व ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण रखता है, जो अपना सर्वस्व भगवान को अर्पित कर देता है, उसकी रक्षा के लिए ईश्वर स्वयं तत्पर रहते हैं। उन्होंने कहा कि भक्तों का भगवान के प्रति समर्पण और प्रेम भाव ही ईश्वर भक्ति का दिव्य स्वरूप है। भक्तिभाव का आधार प्रेम, श्रद्धा और समर्पण है। जब भक्त की कामना या प्रार्थना ईश्वर को समर्पित हो जाये तो समझना सच्ची भक्ति है। जो भक्त हृदय से भगवान का स्मरण करता है, ईश्वर भी स्वयं को उसके अधीन कर देते हैं। इसलिए कहा गया है कि सच्ची भक्ति से भगवान भी भक्त के वश में हो जाते हैं। जगद्गुरू जी ने कहा कि भक्तिभाव का आधार प्रेम, श्रद्धा और समर्पण है। भगवान श्रीराम ने शबरी के जूठे बेर भी प्रेम और भक्तिभाव के कारण खाए। मन में भक्ति भाव के उठने के बाद भक्त के व्यक्तित्व के नकारात्मक गुण दूर हो जाते हैं और उसके व्यक्तित्व में निखार आने लगता हैं। इस प्रकार भक्त अपने अहंकार से मुक्त हो जाता है और उसकी आंतरिक चेतना में ईश्वर की अनुभूति होने लगती है।इस मौके पर जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य जी ,डॉ० सुनीता शास्त्री, जगद्गुरू रामानुजाचार्य स्वामी सूर्य नारायणाचार्य जी,स्वामी शशिधराचार्य जी,स्वामी अनिरुद्धाचार्य करतलिया बाबा सहित बड़ी संख्या में संत साधक मौजूद रहें।

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