: पर्यावरण को संरक्षित करना भी भगवान श्री सीताराम के पद चिन्हों पर चलना होगा: रामदिनेशाचार्य
Mon, Jan 22, 2024
हरिधाम गोपाल पीठ में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान शिव का प्राण प्रतिष्ठा हुआ, अतिथियों का हुआ अभिनन्दन
अयोध्या।राम मंदिर में भगवान रामलला के प्राण प्रतिष्ठा होने के साथ ही पूरे अयोध्या में जश्न का माहौल चारों तरह हुआ। हर कोई राममय हो गये। उसी के साथ हरिधाम गोपाल पीठ में भी भगवान शिव प्राण प्रतिष्ठित हुए। तो दूसरे सत्र में व्यासपीठ से राम कथा की अमृत वर्षा करते हुए जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य जी ने कहा कि भगवान श्री राम का पूरा चरित्र मानव मात्र को संदेश देने के लिए हुआ था। भगवान का जन्म विवाह और वनवास तीनों में मानव जाति को एक सूत्र में ऊंच-नीच के भेदभाव को समाप्त करके एक सूत्र में पिरोने का काम करती है। जगद्गुरु जी ने कहा कि भगवान श्री राम के विवाह के 12 वर्ष बीत जाने के बाद वनवास की लीला प्रारंभ हुई उस समय प्रभु की आयु 27 वर्ष थी और 14 वर्ष के वनवास के पीछे भगवान के राजा अभिषेक की चल रही 14 दिन से तैयारी ही कारक बनी और मंथरा ने उन्हीं 14 दिन का हवाला देते हुए कैकेई से 14 वर्ष के वनवास मांगने की बात राजा दशरथ से कहीं। स्वामी जी ने समाज को संदेश देते हुए कहा कि भगवान श्री राम का वनवास समाज को एक सूत्र में बांधने के लिए हुआ था जहां श्री राम जी वनवासी गिरी वासी पर्वत वासी ऋषि-मुनियों को गले लगा कर के यह संदेश दिया कि ईश्वर की दृष्टि में कोई ऊंच-नीच छोटा बड़ा नहीं है सब एक समान हैं जहां प्रभु श्रीराम प्रयागराज में ब्रह्म ऋषि भारद्वाज पर कृपा करते हैं तो दूसरी ओर उल्टा नाम जपत जग जाना बाल्मीकि भए ब्रह्म समाना। बाल्मीकि पर भी कृपा करते है। श्री आचार्य जी ने कहा हमारे आराध्य प्रभु श्री राम केवट के राजा को गले लगाते हैं तो केवट जैसे छोटी जाति को भी पैर धोने का मौका देते है। श्रीराम के पैरों को पखारनेका मौका केवल 2 लोगों को प्राप्त हुआ जिसमें एक राजा जनक और दूसरा वह केवट जो प्रभु को मां गंगा से पार उतारता है। व्यास जी ने कहा कि वन में रहकर के प्रभु श्री राम माता जानकी पर्यावरण को संरक्षण करने का भी बहुत बड़ा बीड़ा उठाया था। अब हमें भी उनके पद चिन्हों पर चलकर पर्यावरण को संरक्षित करना चाहिए। यजमान नरेश गर्ग,कुसुमलता गर्ग ने व्यासपीठ की आरती उतारी। कथा का संचालन आचार्य रमेश दास शास्त्री व व्यवस्था गौरव दास कर रहें। आज की कथा में कैसरगंज सांसद बृजभूषण शरण सिंह के अयोध्या प्रभारी महेंद्र त्रिपाठी सहित बड़ी संख्या में संत साधक मौजूद रहें।
: राम व्यक्ति नहीं, संपूर्ण जीवन चरित्रः स्वामी<br />चिदम्बरानन्द
Mon, Jan 22, 2024
कहा, हमारे पूर्वजों ने मंदिरों को टूटते देखा हैं, अब हमारी पीढ़ी इसे बनते देख रही
अयोध्या। रामनगरी में आज बड़े श्रद्धा भाव के भगवान राम लला प्रतिष्ठित हो गये। चारों तरफ अयोध्या वासी खुशियाँ मना रहे है। मंदिर मंदिर मंगल गीत गाये जा रहें है। चहुंओर मंगल ध्वनियां बज रही है। राम महल वैदिक भवन में प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव के पावन अवसर पर आयोजित श्रीराम की अमृत वर्षा हो रही है। रामकथा में व्यासपीठ से कथा का रसास्वादन ट्रस्ट, मुंबई के महामंडलेश्वर स्वामी चिदम्बरानन्द सरस्वती जी महाराज करा रहें है। कथा के आज छठवें दिवस व्यासपीठ से कथा स्वामी चिदम्बरानन्दजी महाराज ने बोलना शुरू किया तो लोग भावुक हुए, कभी गहरी सोच में पड़ गए। श्रीराम का चरित्र सुनकर कभी तालियां बजने लगतीं तो कभी जय श्रीराम का उद्घोष होने लगता। उन्होंने कहा कि राम व्यक्ति नहीं, संपूर्ण जीवन चरित्र हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने सिखाया कि व्यक्ति नहीं, लोकहित ही सर्वोपरि होता है। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने मंदिरों को टूटते देखा हैं, अब हमारी पीढ़ी इसे बनते देख रही है। यह सुन कुछ बुजुर्गों व महिलाओं की आंखें छलछला आईं तो युवा जय श्रीराम का उद्घोष करने लगे।
उन्होंने कहा कि 2024 श्रीराम वर्ष के रूप में जाना जाएगा। सौ करोड़ रामायण की रचनाएं हुईं। हर कवि राम को नायक बनाना चाहता रहा है। महाभारत में भी राम चरित्र है। राम का प्रमुख गुण शील है, इसीलिए राम - जैसा भाई, राम जैसा बेटा, राम जैसा मित्र तो सभी चाहते हैं। रावण ने कहा था कि अगर शत्रु भी हो तो राम जैसा। राम के मार्ग को अपनाकर हम जीवन का मार्ग पार कर सकते हैं। महामंडलेश्वर स्वामी चिदम्बरानन्द सरस्वती जी महाराज ने लोगों से पूछा कि राम के राजतिलक पर सभी खुश थे सिर्फ दो लोग नाखुश थे, वह कौन थे। लोगों के उत्तर सुनने के बाद उन्होंने कहा कि खुद राम और दूसरी मंथरा। राम सोच रहे थे कि यह वंश को कैसी परपंरा है कि बड़े भाई को राज्य और छोटे को सेवक बनाया जाता है। ज्येष्ठ पुत्र को राजा बनाना अयोध्या की राज परपंरा थी। इसे राम ने तोड़कर लोकतंत्र की स्थापना की। राजमहल छोड़कर राम झोपड़ी तक पहुंचे। जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति तक न पहुंचा जाए तब तक राजा बनने के मायने नहीं।
: सेवा हि परमोधर्म को चरितार्थ कर रहा सियाराम किला झुनकी घाट
Mon, Jan 22, 2024
सियाराम किला मंदिर में प्रतिष्ठित हुए प्रथम आचार्य, महंत करुणानिधान शरण ने आचार्यों का किया अभिनन्दन
जिसकी साधना में निरंतरता होगी, उसी की उपासना भी सफल होगी: प्रभंजनानन्द शरण
अयोध्या। भगवान रामलला के प्राण प्रतिष्ठित के साथ ही आज सिद्धपीठ श्री सियाराम किला झुनकी घाट के प्रथम आचार्य परम पूज्य महंत मिथिलाशरण महाराज का वैदिक मंत्रोच्चार के साथ प्राण प्रतिष्ठित हुए। वैदिक आचार्यों ने पूजन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता झुनकी पीठाधीश्वर महंत करुणानिधान शरण ने किया। तो वही दूसरी तरफ शाम को व्यासपीठ से रामकथा की अमृत वर्षा प्रख्यात कथावाचक प्रेममूर्ति स्वामी प्रभंजनानन्द शरण महाराज कर रहें है। कथा के छटवें दिवस स्वामी प्रभंजनानन्द शरण महाराज ने कहा कि भगवान की कोई आकृति नहीं होती है। भक्त जिस भाव से प्रभु में अपनी आस्था रखता है भगवान उसी स्वरूप में भक्त के समक्ष प्रकट होते हैं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को कर्म में निरंतरता बनाकर रखना चाहिए निरंतरता होने से ही सफलता प्राप्त होती है। अभ्यास के द्वारा मुढ़ से मुढ़ व्यक्ति भी विद्वान बन सकता है जिसकी साधना में निरंतरता होती है उसी की उपासना भी सफल होती है। उन्होंने कहा कि कभी भी स्वयं की तुलना दूसरों से न करें अपने भाग्य की तुलना दूसरों से कर व्यक्ति व्यर्थ ही तनाव लेता है। परमात्मा भाग्य का चित्र अवश्य बनाता है मगर उसमें कर्म रूपी रंग तो व्यक्ति स्वयं भरता है। स्वामीजी ने कहा कि हर परिस्थिति में व्यक्ति को प्रसन्न रहना चाहिए कर्म में निरंतरता बनाकर के रखना चाहिए और यह सूत्र अपने जीवन में उतार ले ईश्वर कृपा से जो प्राप्त है वह पर्याप्त है। इस मौके पर सियारामकिला झुनकी घाट के संत साधक व शिष्य परिकर मौजूद रहें।