: संतों के सानिध्य से ही राष्ट्र और समाज का कल्याण सम्भव: रत्नेशप्रपन्नाचार्य
Wed, May 25, 2022
रामानुजाचार्य जी ने श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण के चतुर्थ दिवस कहा, संत-सत्पुरुषों ने अपनी विद्वता और तपस्या से भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म की पताका सम्पूर्ण विश्व में फहराई
विश्व का सच्चा मित्र वह है जो अच्छे लोगों को आपस में जोड़े ।श्रीराम की पहली यात्रा सभी अच्छे लोगों को आपस में जोड़ने की थी।श्रीराम के कारण ही वशिष्ठ और विश्वामित्र एक हो गये।अयोध्या और मिथिला एक हो गयी। उक्त बातें जगद्गुरू रामानुजाचार्य रत्नेशप्रपन्नाचार्य ने कही। रामानुजाचार्य जी नंदीग्राम,भरतकुंड पर श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण कथा की अमृत वर्षा कर रहें है। कथा के चतुर्थ दिवस व्यासपीठ से कथा का मर्म समझाते हुए रत्नेशप्रपन्नाचार्य जी ने कहा कि महर्षि गौतम और अहल्या आपस में पुन: गये।विश्वामित्र जी ने भगवान राम से कहा कि अब जनकपुर की यात्रा कीजिए। यह जनकपुर की यात्रा क्या है ? यदि इस प्रश्न पर विचार करें तो हमें यह स्पष्ट प्रतीत होगा कि यह ज्ञान-मार्ग की यात्रा है । महाराज जनक उस समय के सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी थे।उनके लिए वाक्य भी यही कहा गया कि वे ज्ञानियों में सिरमौर हैं। और यदि ज्ञान के पथ पर चलेंगे तो सबसे पहला काम है अहिल्या का उद्धार। अहिल्या पत्थर बनी हुई है। गोस्वामीजी कहते हैं कि यह बुद्धि ही अहिल्या है। इसका अभिप्राय है कि जब तक बुद्धि, जड़ से चेतन नहीं होगी तब तक हम ज्ञान मार्ग में आगे बढ़ने में समर्थ नहीं होंगे।भगवान के द्वारा अहिल्या-उद्धार का अभिप्राय है कि विषयासक्ति के कारण जो बुद्धि जड़ हो चुकी थी, उसको श्रीराघवेन्द्र ने चेतन किया। रामानुजाचार्य जी ने कहा कि संतों के सानिध्य से ही राष्ट्र और समाज का कल्याण सम्भव है। संत संगति से ही व्यक्ति के उत्तम चरित्र का निर्माण होने से वे संस्कारवान बनते हैं। संतों का सानिध्य समाज को सन्मार्ग दिखाता है। संत-सत्पुरुषों ने अपनी विद्वता और तपस्या से भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म की पताका सम्पूर्ण विश्व में फहराई है। भारत की धरती प्राचीन काल से ही संतों की तपोभूमि है। संत ही समाज को सही मार्ग दिखाते हैं। इसलिए तपस्वियों के बताये मार्ग का अनुसरण करने से समाज में समरसता एवं भाईचारा बना रहता है।उन्होंने कहा कि सन्तों का सानिध्य समाज को एक सूत्र में बांधे रखता है। यह युगधर्म है। विचारों में मतभिन्नता हो सकती है, परन्तु सबका लक्ष्य और उद्देश्य एक ही है। सभी देश हित में कार्य कर रहे हैं। सन्त हमेशा दूसरों की भलाई कर परोपकार करते हैं। सन्तों के जीवन से प्रेरणा लेकर जीवन को और श्रेष्ठ बनाया जा सकता है।कथा में मणिराम दास छावनी के महंत कमलनयन दास, संत परमात्मा दास सहित बड़ी संख्या में कथा प्रेमी मौजूद रहें।
: जीव को बंधन से मुक्त करती है श्रीमद् भागवत कथा: रामदिनेशाचार्य
Wed, May 25, 2022
रामानन्दाचार्य ने कहा, जीवन में कभी हताश नहीं होना चाहिए,अपना सबकुछ भगवान को सौंप दीजिए सबकुछ उन्हीं को मान लीजिए। अपने आप को समर्पित कर दीजिए। उन पर भरोसा रखिए वो आपकी सभी बिगड़ी बनाने का कार्य करेंगे
व्यासपीठ का पूजन करते यजमान
अयोध्या। पूराबाजार विकास खंड के रहेरवा नारा गांव में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा के दौरान बुधवार को कथा का रसपान कराते हुए जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा जीव को अमरता प्रदान करती है। इसके सुनने मात्र से जीव का कल्याण हो जाता है। यह जीव को सभी बंधनों से मुक्त करती है।
रामानन्दाचार्य जी कथा के द्धितीय दिवस भागवत कथा सुनाते हुए कहते है कि जीवन में कभी हताश नहीं होना चाहिए। अपना सबकुछ भगवान को सौंप दीजिए, सबकुछ उन्हीं को मान लीजिए। अपने आप को समर्पित कर दीजिए। उन पर भरोसा रखिए वो आपकी सभी बिगड़ी बनाने का कार्य करेंगे। उनके बिना सृष्टि में एक पत्ता तक नहीं खरक सकता। वह सृजनकर्ता भी हैं और संहार कर्ता भी। सदैव अपने कर्म अच्छे रखिए। परोपकार और पुण्य कार्य का कोई विकल्प नहीं है। प्रयास कीजिए कि आपके मन, वाणी और कर्म से किसी को कष्ट न पहुंचे। दीनहीनों, गरीबों की सेवा से बड़ा पुण्य कार्य दूसरा कुछ भी नहीं है। परोपकार और पुण्य कार्य करते रहिए आपके जीवन में बड़ी से बड़ी बाधाएं आए फिर भी अपने रास्ते से विचलित न हों। एक समान बने रहिए, बाधाएं आएंगी और कैसे चली गई पता भी नहीं चलेगा। यह स्वयं भगवान की कृपा से संभव होगा। कारण ऐसे लोगों की भगवान कभी बिगड़ने नहीं देते, वह स्वयं नजर रखते हैं।कथा से पूर्व व्यासपीठ का पूजन मुख्य यजमान श्रीमती मिथलेश सिंह व अखंड प्रताप सिंह ने किया। श्रीमद् भागवत कथा महोत्सव का संचालन गौरव दास शास्त्री व शिवेन्द्र शास्त्री कर रहे है। कथा में आज बड़ी संख्या में कथा प्रेमी मौजूद रहें।
: प्रियाप्रतीम रास कुंज के महंत बने श्रीकांत प्रत्यूष दास
Wed, May 25, 2022
रामनगरी के संतो ने दिया कंठी चादर
अयोध्या। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या के राजघाट स्थित प्रियाप्रीतम रासकुंज का नया महंत श्रीकांत प्रत्यूष दास काे संत-महंत और धर्माचार्याें ने कंठी, चद्दर, तिलक देकर महंती प्रदान किया। आश्रम के वयाेवृद्ध महंत परमानंद दास महाराज ने कहा कि उन्हें एक याेग्य उत्तराधिकारी की तलाश थी। जाे मंदिर का कार्यभार संभाल व यहां की व्यवस्था सुचारू रूप से चला सके। वह तलाश अब जाकर पूरी हुई। मठ के महंत पद पर उनके शिष्य श्रीकांत प्रत्यूष दास की नियुक्ति की गई है। उनसे आशा है कि वह मंदिर की व्यवस्था अच्छे ढंग से चलायेंगे। प्रत्यूष दास ने कहा कि उन्हें आश्रम की बागडाेर साैंपी गई है। अयाेध्या के विशिष्ट संताें ने महंती दी है। इस पर वह खरा उतरेंगे। ऐसा काेई कार्य नही करेंगे, जिससे महंत पद तथा मंदिर की प्रतिष्ठा पर आंच आए। हमेशा पद की गरिमा बनाकर रखेंगे। मठ में ठाकुर जी और गाै, संत, विद्यार्थी, आगंतुक सेवा भली-भांति चलती रहेगी। सदैव मंदिर के उत्तराेत्तर विकास में संकल्पित रहेंगे। अंत में नवनियुक्त महंत आए हुए संताें का स्वागत-सत्कार किया। महंताई समारोह में जगतगुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य, श्रीरामवल्लभाकुंज अधिकारी राजकुमार दास, पूर्व डीजीपी बिहार गुप्तेश्वर पांडेय, रसिक पीठाधीश्वर महंत जन्मेजय शरण, बड़ा भक्तमाल महंत स्वामी अवधेश कुमार दास, नयामंदिर शीशमहल पीठाधीश्वर महंत रामलाेचन शरण, महंत अर्जुन दास, महंत अजय दास, महंत कमलादास रामायणी, वीरेंद्र दास, जगन्नाथ दास, नागा रामलखन दास, पराशर महाराज, महेश शुक्ला, संत प्रसाद मिश्रा, विदिशा से लखन शास्त्री आदि संत-महंत एवं भक्तगण माैजूद रहे।