: विवाह के बाद मनाया गया कलेवा, गीतों पर झूमते रहे श्रद्धालु
Sun, Dec 8, 2024
विवाह के बाद मनाया गया कलेवा, गीतों पर झूमते रहे श्रद्धालुश्री हनुमान बाग में लगा छप्पन भोग, महंत जगदीश दास ने भगवान को खिलाया कलेवाअयोध्या। वैष्णव नगरी अयोध्या में उपासना की दो अलग-अलग शाखाएं हैं। इन शाखाओं में दास परम्परा और सख्य परम्परा शामिल है। मिथिला धाम से अपना रिश्ता जोड़ने वाले मधुरोपासक कहलाते हैं और सख्य भाव से राम व सीता के रूप में दूल्हा-दुलहिन सरकार की उपासना करते हैं। इन दोनों ही परम्पराओं के उपासक संत रामानंद सम्प्रदाय के प्रथम आचार्य के रूप में देवी सीता जी को ही स्वीकारते हैं। गुरु वंदना में सीतानाथ समारम्भाम् रामानंदार्य मध्यमाम अस्मादचार्य पर्यन्ताम वंदे श्रीगुरु परम्पराम् इसी श्लोक का वाचन किया जाता है। फिर भी दास परम्परा के उपासक राजा राम व हनुमान जी की उपासना दास यानी कि सेवक भाव से करते हैं। इसके समानान्तर सख्य भाव के उपासक सखी भाव की गुप्त उपासना करते हैं। इन संतों की मान्यता है कि जनकपुर में विवाह के बाद भगवान दुलहिन सरकार के साथ दूल्हा सरकार के रूप में ही विराजते हैं। यही कारण है कि ये उपासक श्रीरामचरित मानस के पारायण के दौरान विवाह प्रसंग तक का ही पारायण करते हैं। पूजन-अर्चन के दौरान सिर पर पल्लू रखकर त्रिरयोचित भाव से ही आराध्य को रिझाते हुए उनसे अनुनय-विनयपूर्वक प्रत्येक क्रिया करते हैं।
रामनगरी में पिछले पांच दिनों से चल रहे राम विवाह महोत्सव में आज आखरी दिन कलेवा का कार्यक्रम किया गया। जिसमे भगवान राम और तीनो भाइयो को उपहार देकर विदाई के समय गाली देकर विदा किए जाने का कार्यक्रम किया गया। भगवान की जनक पूरी से विदाई के लिए महिलाएं भगवान राम के अचर धराई किया गया जिसमें दूरदराज से अयोध्या पहुंचे।
वासुदेव घाट स्थित प्रसिद्ध पीठ श्री हनुमान बाग मंदिर में विवाह महोत्सव बड़े ठाठ से मनाया गया, हनुमानगढ़ी के नागा साधुओं के बीच भव्य बारात निकली, महोत्सव का समापन आज छप्पन भोग व कलेवा के साथ हुआ। शनिवार काे आश्रम में राम कलेवा धूमधाम के साथ मनाया गया। रामनगरी के नामचीन कलाकारों द्वारा कलेवा के अनेकाें गीत गाए गए। पूरा वातावरण भक्तिमय माहाैल में रंगा रहा। भक्तगण अपनी सुध-बुध खाेकर झूमने काे मजबूर दिखे। इस माैके पर महंत जगदीश दास ने कहाकि आश्रम में रामबारात निकालने की परंपरा है। विवाहोत्सव बड़ी ही भव्यता व धूमधाम से मनाया जाता है, जिसका सिलसिला देररात्रि तक चलता है। उसके अगले दिन कलेवा व छप्पन भोग महाेत्सव मनाया जाता है। काफी संख्या में भक्तगण सम्मिलित हाेते हैं। रामविवाह महाेत्सव मनाने की परंपरा मंदिर में सैंकड़ो वर्षाें से चल आ रही है। उस परंपरा को आज भी हम लाेग अक्षुण्ण बनाए हुए हैं। उसी के परिप्रेक्ष्य में इस बार भी रामविवाह और कलेवा मनाया गया। इसमें देश के कई प्रांताें से भक्तगण सम्मिलित हुए। इस मौके पर महंत मामा दास, सूर्य भान दास, लवकुश दास, उपेंद्र दास, पुजारी योगेंद्र दास,सुनील दास, रोहित शास्त्री, नितेश शास्त्री सहित बड़ी संख्या में संत साधक मौजूद रहें।
: निकली भगवान राम की बारात, बाराती बनकर झूमी अयोध्या
Sat, Dec 7, 2024
निकली भगवान राम की बारात, बाराती बनकर झूमी अयोध्याराम बारात में झूमकर नाचे बाराती, विविध रूप और वेशभूषा में निकले बाराती राममय हुई अयोध्याश्री कनक भवन, श्री हनुमान बाग,श्री जानकीमहल ट्रस्ट, श्री दशरथ जी का राजमहल बड़ी जगह, श्री रंग महल सहित दर्जनों मंदिरों से निकली भगवान राम की भव्य बारातअयोध्या। पुण्य सलिला मां सरयू के किनारे बसी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की जन्मस्थली अयोध्या में विवाह पंचमी के शुभ अवसर अयोध्या के विभिन्न मंदिरों से श्री राम की बारात निकाली गयी। इस भव्य राम बारात में भगवान श्री राम के पिता और गुरु की भूमिका में अयोध्या के वरिष्ठ संत मौजूद रहे। वही इस बारात में शामिल हज़ारो बाराती ढोल नगाडो की धुन पर थिरकते नज़र आये राम विवाह के मौके पर पूरी अयोध्या भक्ति रस में रंगी नज़र आई और राम बारात का नगर के अलग अलग स्थानों पर पुष्प वर्षा कर स्वागत किया गया। जगत नियंता भगवान श्री राम अपने अनुजों समेत सजधज कर निकले अपनी बारात। चहुंओर हर कोई नाचते गाते निकले भगवान की बारात। हाथी घोड़े ऊट बैडबाजे बारात की शोभा बड़ा रहे थे। हर शक्स खुशी में झूमता नजर आ रहा था। अपने आराध्य के शादी का जश्न लोगों के सर चढ़ बोल रहा था। बड़े ठाटबाट से निकली भगवान श्रीराम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न की बारात और उतने ही ठाटबाट से निकले भगवान के बाराती।मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की नगरी अयोध्या में राम विवाह उत्सव लगभग सप्ताह भर से चल रहा है वही विवाह पंचमी के शुभ अवसर पर भगवान श्री राम और जनकनंदिनी सीता का विवाह कार्यक्रम होता है इस मौके पर अयोध्या के मठ मंदिरों से बारात निकाली जाती है। जिसमे एक मंदिर से में बारात लेकर प्रतीकात्मक रूप से जनकपुर बनाए गए दुसरे मंदिर तक पहुचती है जहां चारो भाई राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघन सहित सभी बारतियो का स्वागत किया गया।प्रसिद्ध पीठ श्री हनुमान बाग का विवाहोत्सव भी बड़ा सुंदर व देखने योग्य रहा। महंत जगदीश दास जी महाराज के अगुवाई में सजधज कर निकले बाराती फिजाओं में चार चांद लगा रहे थे। बारात में भगवान शंकर, हनुमानजी के स्वरूप पूरे माहौल को भक्ति मय कर रहें थे। बारात की अगुवाई खुद हनुमान बाग पीठाधीश्वर महंत जगदीश दास महाराज कर रहें थे। उनके साथ रामनगरी के विशिष्ट संत भी भगवान राम के बाराती बन नाचते गाते जा रहे थे। इस मौके पर जगद्गुरु परमहंस आचार्य,गद्दी नशीन जी के शिष्य महंत मामा दास, उपेंद्र दास, सूर्य भान दास,लवकुश दास सहित सैकड़ों संत मौजूद रहें। व्यवस्था में पुजारी योगेंद्र दास, सुनील दास, रोहित शास्त्री,नितेश शास्त्री सहित हनुमान बाग से जुड़े शिष्य परिकर लगे रहे। जानकीमहल ट्रस्ट का विवाहोत्सव बड़ा ही अद्भुत व अनोखा है। मिथिला पद्धति की उपासना प्रधान होने के कारण से किशोरी जी का मायका होता है। यहां पर भगवान राम का दुल्हा सरकार के रुप में पूजा होती है। मारवाड़ी ठाटबाट देखने को बनता है। पूरे विधि विधान से विवाहोत्सव मनाया जाता है। ट्रस्टी युवा समाजसेवी आदित्य सुल्तानिया कहते है कि हमारी पूजा ही मिथिला पद्धति से है। हम किशोरी जी को बेटी व राम जी को दुल्हा सरकार के रुप में उपासना करते है। इस मौके पर ट्रस्ट से जुड़े दिलीप सुल्तानिया,अजीतसरिया, विष्णु अजीत सरिया, चंद्रप्रकाश अग्रवाल, बिहारी लाल सर्राफ, मुरारीलाल अग्रवाल, सुनील कुमार, आशीष भिवानीवाला, प्रदीप लोहारीवाला, दिनेश अग्रवाल, नीता सुल्तानिया, अरुण सुल्तानिया,मधुर चिरेनीवाल, नरेश पोद्दार सहित जानकी महल ट्रस्ट परिवार परिवार विवाहोत्सव में आनंदित हो रहा था।
: गुरुओं का संघर्ष शौर्य-शहादत की मिसाल से परिपूर्ण है: ज्ञानी गुरुजीत सिंह
Sat, Dec 7, 2024
गुरुओं का संघर्ष शौर्य-शहादत की मिसाल से परिपूर्ण है: ज्ञानी गुरुजीत सिंहमानवता के महान दूत और बलिदानियों के सिरमौर नवम सिख गुरु तेगबहादुर महाराज का 349वां बलिदान दिवस ऐतिहासिक गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड अयोध्या में निष्ठापूर्वक मनाया गयाअयोध्या। मानवता के महान दूत और बलिदानियों के सिरमौर नवम सिख गुरु तेगबहादुर महाराज का 349वां बलिदान दिवस ऐतिहासिक गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड अयोध्या में निष्ठापूर्वक मनाया गया। इस अवसर पर गुरु के अप्रतिम अवदान का विमर्श छिड़ा। ब्रह्मकुंड गुरूद्वारा के मुख्यग्रंथी ज्ञानी गुरुजीत सिंह ने बताया कि गुरु तेग बहादुर साहब तिलक एवं जनेऊ के लिए बलिदान दिए थे। शुक्रवार को उनका बलिदान दिवस मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की नगरी अयोध्याधाम स्थित ऐतिहासिक ब्रह्मकुंड गुरुद्वारा में मनाया गया है, जिसमें अयोध्या के संत महंत भी सम्मिलित हुए और गुरु तेगबहादुर के बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित कर भावरूपी अनुराग व्यक्त किया। उन्होंने बताया कि जब देश पर मुगलों का आक्रमण हुआ करता । तब-तब गुरु ने रक्षा के लिए तलवार उठाई। मुगलों द्वारा तोड़े गए श्रीराम मंदिर पर पुनः भव्य निर्माण हाे गया है, जिससे पूरा समाज खुशी से झूम रहा है। 22 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राममंदिर की प्राण प्रतिष्ठा किया। हम सभी मंदिर निर्माण से गदगद हैं। इस माैके पर दर्जनों संत-महंतों ने उपस्थित होकर के गुरु तेग बहादुर के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। इससे पूर्व गुरुग्रंथ साहब के 101 अखंड पाठ की लड़ी का समापन किया गया। कार्यक्रम का समापन लंगर से हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।बलिदान दिवस के कार्यक्रम को यादगार बनाने वालों में गुरुद्वारा प्रबंधन से जुड़े अधिवक्ता कुलवीर सिंह, सुरजीत सिंह, चरनजीत सिंह आदि प्रमुख रहे। इस अवसर पर मणिरामदास छावनी के उत्तराधिकारी महंत कमलनयन दास, एसएसपी राजकरण नैय्यर, कथावाचक हरमिंदर सिंह अंबाला, भाई प्रीतम सिंह, भाई प्रदीप सिंह, भाई महेंद्र सिंह, सिमरनजीत कौर, भाजपा नेता अभिषेक मिश्रा आदि माैजूद थे। वहीं ब्रह्मकुंड गुरुद्वारा के महंत बलजीत सिंह ने बताया कि गुरु जी के बलिदान दिवस पर संगत का आयोजन किया गया। जिसमें अयोध्या, लखनऊ, नवाबगंज, फैजाबाद, गोंडा, सुल्तानपुर, अकबरपुर सहित अन्य जिलों के संगत के लोग अयोध्या पहुंचे, गुरु जी को नमन किया। उन्होंने बताया कि गुरु मानवता के उन्नायक रहे हैं। नवम गुरु के बलिदान से इस दिशा में गुरुओं के प्रयास का चरम परिलक्षित है। उन्होंने कहा, गुरु का स्पष्ट सूत्र था कि न जुल्म करेंगे और न जुल्म सहेंगे। गुरुओं का संघर्ष शौर्य-शहादत की मिसाल से परिपूर्ण है। सदियों तक यह प्रतीत होता रहा कि गुरु व उनके अनुयायी जिस सनातन धारा की अस्मिता के लिए सर्वस्व न्योछावर करते रहे। उसके हिस्से संघर्ष ही संघर्ष है, पर आज वे मूल्य और आदर्श प्रतिष्ठापित हो रहे हैं, जिनकी अखंडता-अक्षुण्णता के लिए गुरुओं ने जान की बाजी लगाने की परंपरा विकसित की।