: ईद मिलादुन्नबी को झंडों और जुलूस तक सीमित मत रखिए: सुल्तान अंसारी
Sun, Oct 9, 2022
दुनिया बदल रही है अब मुसलमानों को भी अपने को बदलना चाहिए है।रामनगरी अयोध्या के समाजसेवी फिल्म प्रड्यूसर सुल्तान अंसारी ईद मिलादुन्नबी की मुबारकबाद देते हुए अपने समाज को तरक्की की ओर आगे बढ़ने की नसीहत देते हुए कहते है कि आलम-ए-इसानियत के पैगम्बर.. शांति और सद्भावना के पैरोकार पैगंबर मुहम्मद की यौम-ए-पैदाइश मुसलमानों का सबसे बड़ा त्योहार है।
इस त्योहार के पारंपरिक रंगों में बड़े-बड़े पराठे.. रंगीन हलवा.. झंडे और जुलूस…. ये क्या??? ये ही काफी नहीं है।
जदीद दौर के कुछ तकाज़े होते है। डिबेट होती। डोनेशन के कार्यक्रम होते। मुसलमान अपने गैर मुस्लिम भाइयों के साथ अपने रसूल के अस्ल पैगाम को साझा करते। विज्ञान, शिक्षा, त्याग, शांति, सद्भावना, महिलाओं के सम्मान, मुल्कपरस्ती पर रसूल की हदीसों से दुनिया को वाकिफ किया जाता। इस्लाम शांति के लिए है विध्वंस के लिए नहीं। जेहाद और पर्दा जनकल्याणकारी और डिफेंसिव है। इन बातों की व्याख्या होती तो लगता कि मुसलमान भी वक्त और जरूरत के हिसाब से बदल रहा है।
: कलात्मक स्वतंत्रता की आड़ में पौराणिक आख्यानों का अपमान
Sun, Oct 9, 2022
प्रभु श्रीराम के चरित्र में न तो आक्रामकता थी, न ही रावण के चरित्र में कमीनापन
अनंत विजय। फिल्म आदिपुरुष के अंश में रावण को देखकर कुछ लोग ये कह रहे हैं कि ये रावण कम खिलजी ज्यादा लग रहा है। खितुलसीदास, वाल्लमीकिजी लगे या कोई और लेकिन रावण की लोक में प्रचलित छवि से बिल्कुल अलग है। रावण के गुणों के बारे में वाल्मीकि और तुलसीदास दोनों ने विस्तार से लिखा है। लंकेश इतना बड़ा और पराक्रमी राजा था कि उसने तीनों लोक को जीता था। वो बहुत बड़ा शिव भक्त था, तपस्वी था लेकिन अहंकारी था। फिल्म आदिपुरुष में जो रावण बनाया गया है वो अहंकारी तो बिल्कुल नहीं दिखता है, हां उसके चेहरे पर, उसकी संवाद अदायगी या हावभाव में कमीनापन अवश्य दिखता है। रावण अहंकारी अवश्य था लेकिन उसके कमीनेपन का चित्रण न तो वाल्मीकि ने किया है और न ही तुलसीदास ने। आदिपुरुष फिल्म के निर्देशक ने किस तरह से रावण के चरित्र को गढ़ा है, उनका सोच क्या था ये तो वही बता सकते हैं। लोक में व्याप्त लंकेश की छवि को इस तरह से भ्रष्ट करना और फिर उसका हास्यास्पद तरीके से बचाव करके फिल्म से जुड़े लोग अपनी अक्षमता को ढंकने का प्रयास कर रहे हैं। प्रभु श्रीराम और रामकथा के पात्रों को लेकर वाल्मीकि का जो सोच था या जो तुलसी की अवधारणा थी उसका शतांश भी इस फिल्म में नहीं दिखाई दे रहा है। फिल्म में हनुमान की वेशभूषा को भी आधुनिक बनाने के चक्कर में निर्माता- निर्देशक ने क्या गड़बड़ियां की हैं ये फिल्म प्रदर्शित होने के बाद पता चलेगी। फिलहाल तो जो कुछ दृश्य है जिसको लेकर अनुमान लगाया जा सकता है कि वहां भी गड़बड़ी हुई है।
कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर पौराणिक आख्यानों के चरित्रों को इस तरह से प्रदर्शित कर अपमानित करने की छूट नहीं दी जा सकती है। लोक में व्याप्त छवि से छेड़छाड़ करके फिल्में सफल नहीं हो सकती हैं। कुछ दिनों पूर्व प्रदर्शित फिल्म सम्राट पृथ्वीराज में भी लोक में प्रचलित छवि से अलग दिखाया गया। परिणाम सबके सामने है। अगर उस फिल्म में चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने लोक में व्याप्त कथाओं के आधार पर पृथ्वीराज का चरित्र गढ़ा होता तो सफल हो सकते थे। चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने तो पृथ्वीराज रासो पर खुद को केंद्रित रखा लेकिन आदिपुरुष के लेखक और निर्देशक न तो वाल्मीकि के करीब जा सके और न ही तुलसी के। संभव है कि उन्होंने अंग्रेजी की कोई फिल्म देखी होगी और उनको लगा होगा कि तकनीक का प्रक्षेपण करके हिंदी में भी इस तरह की फिल्म बनाई जाए। इन दिनों हिंदू पौराणिक आख्यानों पर आधारित फिल्में दर्शकों को पसंद आ रही है। निर्माताओं ने सोचा होगा कि रामकथा को तकनीक के सहारे कहा जाए तो सफलता के सारे कीर्तिमान ध्वस्त किए जा सकते हैं। इस फिल्म से जुड़े लोग ये भूल गए कि राम का जो उद्दात चरित्र भारतीय जनमानस पर अंकित है उसके विपरीत जाने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेगा। अगर गंभीरता से फिल्मकार काम करना चाहते थे तो उनको गीताप्रेस गोरखपुर स्थित लीला चित्र मंदिर जाकर वहां लगी तस्वीरों को देखना चाहिए था, इससे उनकी फिल्म के पात्रों को प्रामाणिकता मिलती और लोक को संतोष और उनको सफलता।
: गौ वंश के अपमान से अतिवृष्टि और अनावृष्टि जैसी विभीषिका को लोग तैयार रहें: राजेंद्रदेवाचार्य
Sat, Oct 8, 2022
श्रीरामहर्षण मैथिल सख्यपीठ धर्मार्थ सेवा ट्रस्ट चारूशिला मंदिर में चल रहे 108 कुंडीय श्रीराममंत्र महायज्ञ का उल्लास चरम पर
अद्वितीय महायज्ञ में वैदिक आचार्यों द्धारा 501 यजमान हवन कुंड में डाल रहें राममंत्र की आहुतियां
अयोध्या। श्रीरामहर्षण मैथिल सख्यपीठ धर्मार्थ सेवा ट्रस्ट चारूशिला मंदिर, जानकीघाट में चल रहे 108 कुंडीय दस दिवसीय श्रीराममंत्र महायज्ञ व श्रीराम कथा महोत्सव में व्यासपीठ से वृंदावन धाम के श्रीमद् जगद्गुरू द्वाराचार्य मलूकपीठाधीश्वर डॉ. राजेंद्रदेवाचार्य के मुखारविंद से हो रही है। कथा के तृतीय दिवस मलूकपीठाधीश्वर ने कहा कि गौ वंश के अपमान के कारण अतिवृष्टि और अनावृष्टि जैसी विभीषिका को लोग तैयार रहें। प्रकृति दंड देती है। उन्होंने कहा कि महापुरुषों का सम्पूर्ण जीवन ही उपदेश होता है। वे वाणी से नहीं अपने आचरण से संदेश, उपदेश देते हैं। महाराज ने शनिवार को सनकादि ऋषियों का जीवन चरित्र बताया।
डॉ. राजेंद्रदेवाचार्य ने कहा कि भगवान की कथा सुनने से पक्षी भी मौन हो जाते हैं। जिस तरह भवरें को गुंजन लोगों को भाता है, उसी तरह कथा लोगों के लिए भाती है। हर किसी को इसका श्रवण करना चाहिए। उन्हाेंने तुलसी की महत्वता बताते हुए कहा कि भगवान को तुलसी अच्छी लगती थी। तुलसी का तप सबसे अधिक है। तुलसी ठाकुर जी की पसंद भी है। इसका कारण यह है कि तुलसी की गंध भी किशोरी जी की गंध से मिलती है।
महाराज ने कहा कि गत रात्रि से हो रही वृष्टि से चिंतित न हो, आप कथा श्रवण करें, क्योंकि कथा व सत्संग ही मानव की अंतरंग तपन को विनष्ट करती है तथा यह वृष्टि बहिरंणतप का हरण करती है। महान भक्त चरित्रों में सनकादिक जी के माध्यम मानव जन्म का लक्ष्य क्या है। पर निवृत्ति मार्ग पर विषद विवेचन में कहा कि वैराग्य होना चाहिए। उपदेश वाणी द्वारा न कहा जाए, उसे निज की चर्या से चरितार्थ होकर लोगों को समझ में आए। जिनका ये महामहोत्सव मनाया जा रहा उन्होंने कहा कि भक्तमाली जी की जीवन चर्या व्यवहारिक रूप में देखने को मिलती थी, जो अनुगतों को उपदेश की सम्वाहक होती थी, संत और भक्त की महिमा अतुलनीय बताते हैं कि भक्त एवं संत ही भगवान के अस्तित्व का बोध कराते हैं। गौमाता में भगवान के स्वरूप का हम दर्शन करें। निरंतर हो रही प्राकृतिक आपदा, विपलव, अनावृष्टि, अतिवृष्टि तथा अन्यान्य मानव विरोधी घटनाएं केवल गौवंश के अपमान के कारण ही घटित हो रही हैं। कथा में कार्यक्रम के संयोजक श्रीरामहर्षण मैथिल सख्यपीठ चारूशिला मंदिर के श्रीमज्जगद्गुरू रामानंदाचार्य स्वामी वल्लभाचार्य महाराज, डा रामानन्द दास, रसिक पीठाधीश्वर महंत जनमेजय शरण, महंत अवधेश दास, महंत रामजीशरण सहित हजारों की संख्या में संत साधक मौजूद रहें। तो वही इस अद्वितीय महायज्ञ में वैदिक आचार्यों द्धारा 501 यजमानों हवन कुंड में राममंत्र की आहुतियां डाल रहें है। कार्यक्रम में देर शाम वृंदावन की प्रसिद्ध चैतन्य महाप्रभु लीला का मंचन हुआ।