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पुरुषोत्तम मास में रामनगरी हुई भक्तिमय : रामकथा और श्रीमद्भागवत कथा की रसधारा से गूंज रहे मठ-मंदिर, संतों ने बताया मर्यादा और भक्ति का महत्व

पुरुषोत्तम मास में भक्ति रस से सराबोर हुई रामनगरी

रामकथा और श्रीमद्भागवत कथा में उमड़ रहे श्रद्धालु, संतों ने बताया मर्यादा, त्याग और भक्ति का महत्व

अयोध्या। मलमास (पुरुषोत्तम मास) के पावन अवसर पर धर्मनगरी अयोध्या इन दिनों पूरी तरह भक्ति और आध्यात्मिक चेतना के रंग में डूबी हुई है। विभिन्न मठों, मंदिरों और आश्रमों में संत-महात्माओं के मुखारविंद से श्रीरामकथा और श्रीमद्भागवत कथा की अमृतमयी रसधारा प्रवाहित हो रही है। कथा स्थलों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है और पूरा वातावरण राममय एवं भक्तिमय बना हुआ है। संत समाज कथा के माध्यम से श्रद्धालुओं को धर्म, मर्यादा, त्याग और आदर्श जीवन का संदेश दे रहा है।

मणिरामदास की छावनी स्थित धर्म मंडप में आयोजित श्रीरामकथा में जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य ने श्रीराम के वनगमन, श्रृंगवेरपुर में केवट प्रसंग और भरत मिलाप की मार्मिक कथा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भरत मिलाप का प्रसंग त्याग, प्रेम और अटूट भक्ति का अनुपम उदाहरण है। भरत ने राजसिंहासन स्वीकार करने के बजाय श्रीराम की चरण पादुका को सिंहासन पर स्थापित किया और स्वयं तपस्वी जीवन व्यतीत किया। यह प्रसंग समर्पण, आदर्श भाईचारे और धर्मनिष्ठा की सर्वोच्च मिसाल है। कथा के दौरान श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। यह आयोजन अग्रवाल समाज सेवा ट्रस्ट एवं श्री लक्ष्मीनाथ सेवा समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है।

उधर, रामकथाकुंज में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में मंदिर के पीठाधीश्वर श्रीमहंत डॉ. रामानंद दास ने श्रीकृष्ण जन्मोत्सव प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा, “जन्मांतरे यदा पुण्यं तदा भागवतं लभेत”, अर्थात अनेक जन्मों के पुण्य उदय होने पर ही मनुष्य को श्रीमद्भागवत कथा श्रवण का सौभाग्य प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा एक अमर कथा है, जिसका श्रवण करने मात्र से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में आध्यात्मिक चेतना का संचार होता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कथा को केवल सुनने तक सीमित न रखकर उसे जीवन में उतारने का आह्वान किया।

इसी क्रम में सावर्थिया सेवा सदन में चल रहे “तुलसी कथा रघुनाथ की” श्रीरामकथा महोत्सव में जगद्गुरु रत्नेश प्रपन्नाचार्य ने मर्यादा और अनुशासन पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि रामायण मानव जीवन का व्याकरण है। जिस प्रकार व्याकरण शब्दों को अनुशासित करता है, उसी प्रकार भगवान श्रीराम का चरित्र मनुष्य को अनुशासित और मर्यादित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

उन्होंने कहा कि जब प्रकृति अपनी मर्यादा तोड़ती है तो विनाश होता है। उसी प्रकार जब मनुष्य धर्म और मर्यादा से विमुख होता है तो समाज में अव्यवस्था और अराजकता फैलती है। मर्यादा का अर्थ सीमा है। नदी और समुद्र जब अपनी सीमाओं में रहते हैं तभी उपयोगी होते हैं, लेकिन सीमा लांघते ही विनाश का कारण बन जाते हैं। मानव जीवन भी धर्म और संस्कारों की मर्यादा में रहकर ही कल्याणकारी बनता है।

पुरुषोत्तम मास के अवसर पर अयोध्या में चल रहे इन धार्मिक आयोजनों से श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है। कथा श्रवण के माध्यम से लोग आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त कर धर्म, भक्ति और मर्यादा के आदर्शों को जीवन में अपनाने का संकल्प ले रहे हैं।

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