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: महापुरुषों का सानिध्य और उनका संग सार्थक व सर्वदा हितकर :आचार्य पुण्डरीक 

बमबम यादव

Sat, Jun 15, 2024

श्रीमहंत नृत्यगोपाल दास जी महाराज के 86 वे पावन जन्मोत्सव के उपलक्ष्य पर आयोजित श्रीमद् भागवत कथा का हुआ भव्य शुभारंभ

व्यासपीठ से कथा की अमृत वर्षा कर रहें राधारमण भगवान के परमभक्त ख्यातिलब्ध कथाव्यास श्री मन्माधव गौड़ेश्वर वैष्णव आचार्य पुण्डरीक गोस्वामी जी

अयोध्या। रामनगरी के प्रसिद्ध पीठ श्री मणिरामदास छावनी में श्रीमहंत नृत्यगोपाल दास जी महाराज 

का 86 वां जन्मोत्सव का आज भव्य शुभारंभ हो गया है। जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में व्यासपीठ से श्रीमद् भागवत कथा की अमृत वर्षा कर रहें राधारमण भगवान के परमभक्त ख्यातिलब्ध कथाव्यास श्री मन्माधव गौड़ेश्वर वैष्णव आचार्य पुण्डरीक गोस्वामी जी। कथा का शुभारंभ पूर्व उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने किया। इस मौके पर महंत हरिसिद्ध शरण, महंत रामानंद दास,महंत मिथलेश नन्दनी शरण, महंत डा भरत दास, महामंडलेश्वर अखिलेश्वर नन्द, महापौर गिरीश पति त्रिपाठी व कार्यक्रम के संयोजक महंत श्री कमल नयन दस जी महाराज, उत्तराधिकारी श्री मणिरामदास छावनी सेवा ट्रस्ट ने अपने विचार रखें। अध्यक्षता श्रीमहंत नृत्यगोपाल दास जी महाराज कर रहें। कथा का विस्तार करते हुए आचार्य पुण्डरीक ने कहा कि ऊँचे लक्ष्य का निर्धारण करें, निंदा-स्तुति, लाभ-हानि की चिन्ता किए बिना उद्देश्य पूर्ण व सार्थक जीवन जीये तथा लक्ष्य की प्राप्ति तक आगे बढ़ते रहें।उन्होंने कहा कि ऊर्जावान, उत्साहित तथा सत्यनिष्ठ व्यक्तियों के संग से मन में एकाग्रता और विचारों की स्पष्टता और भावनाओं का संतुलन प्रकट होता है। इसलिए महापुरुषों का सानिध्य और उनका संग सार्थक व सर्वदा हितकर है। आचार्य ने कहा कि जन्मांतरे यदा पुण्यं तदा भागवतं लभेत! अर्थात जन्म-जन्मांतर एवं युग-युगांतर में जब पुण्य का उदय होता है तब जीवमात्र को ऐसे सुअवसर प्राप्त होते है। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा सुनने मात्र से ही कट जाते हैं सारे पाप। पुण्डरीक गोस्वामी जी ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा जो सिर्फ मृत्युलोक में ही संभव है। और साथ ही यह एक ऐसी अमृत कथा है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है इसलिए परीक्षित ने स्वर्ग अमृत के बजाए कथामृत का वरण किया किस स्वर्गामृत का पान करने से पुन्यों का क्षय होता है पापों का नहीं। कितु कथा अमृत का पान करने से संपूर्ण पापों का नाश होता है कथा के दौरान उन्होंने वृंदावन का अर्थ बताते हुए कहा कि वृंदावन इंसान का मन है। कभी-कभी इंसान के मन में भक्ति जागृत होती है। परंतु वह जागृति स्थाई नहीं होती। इसका कारण यह है कि हम ईश्वर की भक्ति तो करते हैं पर हमारे अंदर वैराग्य व प्रेम नहीं होता है। इसलिए वृंदावन में जाकर भक्ति देवी तो तरुणी हो गई पर उसके पुत्र ज्ञान और वैराग्य अचेत और निर्बल पड़े रहते हैं। इसमें जीवन्तता और चैतन्यता का संचार करने हेतु नारद जी ने भागवत कथा का ही अनुष्ठान किया। इस मौके पर महेंद्र दास हनुमानगढ़ी बलरामपुर,संत भगवान दास,शरद शर्मा विहिप,संतोष सिंह सहित बड़ी संख्या में संत साधक मौजूद रहें।

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