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: ईद-उल-अजहा बकरीद का त्यौहार गरीबों की सेवा करके मनायेंगे: सुल्तान

बमबम यादव

Sun, Jun 16, 2024

इस्लाम धर्म में कुर्बानी का बहुत बड़ा महत्व है, कुर्बानी अल्लाह को राज़ी और खुश करने के लिए की जाती: नन्हे मिंया

बकरीद को लेकर मोहम्मद इमरान ने कर रही है व्यापक तैयारी

अयोध्या। ईद के बाद बकरीद का त्योहार मुस्लिम समुदाय के लोगों का दूसरा सबसे बड़ा त्योहार होता है। बकरीद को ईद-उल-अजहा भी कहते हैं। ये त्योहार रमज़ान का पाक महीने खत्म होने के 70 दिन बाद मनाया जाता है। रामनगरी अयोध्या में गंगा जमुनी तहजीब के झंडाबरदार सर्वधर्म समभाव के अध्यक्ष समाजसेवी मोहम्मद इरफान अंसारी नन्हे मिंया के अनुसार, बकरीद का त्योहार 12वें महीने की 10 तारीख को मनाया जाता है। इस बार ईद-उल-अजहा का प्रमुख त्योहार 17 जून दिन सोमवार को मनाया जाएगा। इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग बकरीद के दिन सुबह जल्दी उठकर नहा धोकर नए कपड़े पहने हैं और ईदगाह में ईद की नमाज़ अदा करते हैं। नमाज़ के बाद एक दूसरे से गले मिलकर ईद की मुबारकबाद देते हैं और इसके बाद जानवरों की कुर्बानी का सिलसिला शुरू हो जाता है। नमाज ईदगाह व घरों में अदा की जायेगी।
रामनगरी के समाजसेवी मोहम्मद इमरान कहते है कि इस्लाम धर्म में कुर्बानी का बहुत बड़ा महत्व है। कुर्बानी अल्लाह को राज़ी और खुश करने के लिए की जाती है। उन्होंने कहा कि इस्लाम धर्म की मान्यताओं के अनुसार, एक बार अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम का इम्तिहान लेना चाहा। माना जाता है कि अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम को अपनी राह में उनकी सबसे प्यारी चीज़ को कुर्बान करने का हुक्म दिया था। हज़रत इब्राहिम को सबसे ज्यादा अज़ीज़ अपने बेटे हज़रत इस्माइल ही थे। अल्लाह के इस खास हुक्म के बारे में जब हज़रत इब्राहिम ने अपने बेटे को यह बात बताई, तो वह कुर्बान होने के लिए राज़ी हो गए। वहीं, दूसरी ओर हज़रत इब्राहिम ने भी अपने बेटे की मोहब्बत से बढ़कर अल्लाह के हुक्म को अहमियत दी और वे अल्लाह की राह में अपने दिल के टुकड़े बेटे को कुर्बान करने के लिए राज़ी हो गए। इसके बाद हज़रत इब्राहिम ने जैसे ही आंखें बंद करके अपने बेटे की गर्दन पर छुरी चलाई, तो अल्लाह ने उनके बेटे की जगह भेड़ एक जानवर को भेज दिया और उनके बेटे की जगह जानवर कट गया और बेटा बच गया। उसी समय से अल्लाह के लिए कुर्बानी करने का सिलसिला शुरू हो गया और तब से हर साल मुस्लिम समुदाय के लोग अल्लाह के नाम पर कुर्बानी करते हैं। समाजसेवी मोहम्मद इमरान अंसारी कहते है कि बकरीद मनाने के पीछे हजरत इब्राहिम के जीवन से जुड़ी हुई एक बड़ी घटना है। हजरत इब्राहिम खुदा के बंदे थे, उनका खुदा में पूर्ण विश्वास था। एक बार हजरत इब्राहिम ने एक सपना देखा, जिसमें वे अपने जान से भी ज्यादा प्रिय बेटे की कुर्बानी दे रहे थे।इस सपने को उन्होंने खुदा का संदेश माना। फिर क्या था, उन्होंने खुदा की इच्छा मानकर अपने 10 वर्षीय बेटे को खुदा की राह पर कुर्बान करने का फैसला कर लिया। लेकिन तब खुदा ने उनको अपने बेटे की जगह किसी एक जानवर की कुर्बानी देने का पैगाम दिया। अभिराम दास वार्ड के लोकप्रिय पाषर्द समाजसेवी फिल्म प्रड्यूसर सुल्तान अंसारी कहते हैं कि हम लोग ईद-उल-अजहा बकरीद का त्यौहार गरीबों की सेवा करके मनायेंगे। खुदा के संदेश को मानते हुए अपने सबसे प्रिय मेमने की कुर्बानी दे दी। तब से ही ईद-उल-अजहा के दिन बकरे की कुर्बानी देने की परंपरा शुरु हुई।

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