: भक्ति पाने के लिए सरलता ही सबसे महत्वपूर्ण गुण है: रत्नेशप्रपन्नाचार्य
बमबम यादव
Sat, Dec 16, 2023
चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ जी के राज महल बड़ा स्थान में सीताराम विवाह की मची है धूम
अयोध्या। रामकोट स्थित चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ जी के राज महल बड़ा स्थान में सीताराम विवाह पर आयोजित राम कथा के पंचम दिवस जगद्गुरु रत्नेशप्रपन्नाचार्य ने कहा कि भक्ति को पाने के लिए सरलता ही सबसे महत्वपूर्ण गुण है। इसलिए भगवान राम ने अपने चरित्र के माध्यम से इस सत्य को प्रकट किया। वे स्वयं अत्यंत सरल हैं। इसी सरलता के मार्ग से उन्होंने भक्तिदेवी को पाया और अपने भक्तों से भी इसी सरलता की अपेक्षा रखते हैं। सरलता ही उन्हें सर्वाधिक प्रिय है।उन्होंने कहा कि ज्ञान पाना हो तो पहले श्रद्धा का आश्रय लें और भक्ति पाना हो तो पहले संत का आश्रय लें। यहाँ संयोगवश इन दोनों क्रम का मिलन हो जाता है।रामचरितमानस में दो वाटिकाओ का वर्णन है एक जोगी की वाटिका जो पुष्प वाटिका है और एक भोगी की वाटिका जो अशोक वाटिका है। विदेह नगर की वाटिका पुष्प वाटिका है ,देह नगर की वाटिका है अशोक वाटिका।दोनों वाटिकाओं का केन्द्र बिन्दु जगज्जननी जानकी जी है।”पुष्प-वाटिका" में शब्दों की सुन्दर चित्रकारी द्वारा राम और सीता के मनोभावों का मनोरम वर्णन किया है। मानव रूप में जन्मे राम मानव मन के किसी भी कोमल भाव से अछूते नहीं रहे ,किशोरावस्था में भावी जीवनसंगिनी को निरखते श्रीराम के मन में प्रेम और क्षोभ एक साथ हिलोरे मारता है , वहीँ सीता भी भावी जीवनसाथी के रूप में राम की कामना के साथ पिता जनक के प्रण का स्मरण कर दुखी होती हैं।रत्नेशप्रपन्नाचार्य ने कहा कि गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से भगवान राघवेन्द्र लक्ष्मणजी को साथ लेकर पुष्प लेने पुष्पवाटिका की ओर चले। पुष्प माने क्या ? पुष्प का एक नाम है सुमन। भगवान सुमन चुनने जा रहे हैं। यह सुमन शब्द बड़ा प्रतीकात्मक है। सुमन का एक अर्थ है फूल और दूसरा अर्थ है सुंदर मन। जैसे सुमन में सौरभ होता है, उसी तरह सुंदर मन में भी भक्ति का सौरभ होता है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसे सौरभ का प्रेमी सुमन का संग्रह करता है, उसी तरह भक्ति-सौरभ के प्रेमी भगवान राम सुंदर मन का चयन करते हैं।महोत्सव की अध्यक्षता बिंदुगाद्याचार्य स्वामी देवेंद्रप्रसादाचार्य जी महाराज कर रहें व दिव्य संचालन मंगल भवन व सुंदर सदन पीठाधीश्वर महंत कृपालु राम भूषण दास कर रहें। कथा में सौकड़ों संत साधक मौजूद रहें।
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