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: रामराज्य का अर्थ प्रेम राज्य है और प्रेम हमें समर्पण सिखाता है: जगद्गुरू

बमबम यादव

Sun, Jul 7, 2024

हरिधाम गोपाल मंदिर में राम कथा के सप्तम-दिवस जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य जी ने भरत चरित्र का बड़ा ही सुंदर वर्णन किया

अयोध्या। सच्चा धर्म हमें प्रेम सिखाता है।प्रेम की व्याख्या हमें भरत चरित्र में दिखाई देता है।प्रेम हमें स्वार्थहीन होने सिखाता है।नि:स्वार्थता की अग्नि में तपकर ही प्रेम अपने उज्जवल रूप में अभिव्यक्त होता है।सर्वथा स्वार्थ शून्य व्यक्ति ही संसार में परिवर्तन ला सकता है।भरत जी अवध का सिंहासन ग्रहण करे ,धर्म उसका समर्थन कर रहा था।पर भरत के अन्त: करण ने इसका समर्थन नहीं किया। उक्त बातें जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य जी ने हरिधाम गोपाल पीठ मंदिर में आयोजित राम कथा के सप्तम-दिवस में कही।उन्होंने कहा कि भरत ने धर्म के स्थान पर परमधर्म को स्वीकार किया।भरत का परम धर्म है-सेवा धर्म।जिस रामराज्य को महाराज दशरथ अयोध्या में लाना चाह रहे थे उसके शिल्पकार श्रीभरत बने।क्योंकि रामराज्य की आधारशिला प्रेम है।श्रीभरत के रामप्रेम ने कैकेयी की कठोरता को भी पिघला रख दिया।रामराज्य का अर्थ प्रेम राज्य है और प्रेम हमें समर्पण सिखाता है। जगद्गुरु जी ने कहा कि जहाँ पर केवल देना ही देना है लेना कुछ नहीं है उसी को रामराज्य कहते है।श्रीराम और भरत दोनों की मान्यतायें एक है। जीवन में त्याग श्रेष्ठ है।जहाँ त्याग होगा वहाँ संघर्ष का स्थान ही नहीं रहेगा।उन्होंने कहा कि आजकल भारत देश का हर नेता रामराज्य लाने की बात करते दिखाई देते हैं।किन्तु ध्यान रहे रामराज्य न तो कहीं से लाना पड़ता है न बनाना पड़ता है हमें स्वयं पहले रामराज्य के योग्य नागरिक बनना पड़ता है।जिस दिन भरत की तरह प्रेम और त्याग हमारे जीवन में आ जायेगा हम सम्पत्ति को अपनी नहीं प्रभु की मान लेगें उसी दिन रामराज्य की अवधारणा सत्य हो जायेगी। कथा में भक्तों का भारी हुजूम रहा। महोत्सव का संचालन आचार्य रमेश शास्त्री व देखरेख गौरव दास ने किया। रामकथा में बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहें।

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