: रामकथाओं से रस से सराबोर हो रही रामनगरी
बमबम यादव
Fri, Apr 12, 2024
रामनवमी मेला अपने शबाब पर,चहुंओर हो रहा नवाह्न पारायण, बधाईयाँ व रामकथा


दशरथ राजमहल बड़ा स्थान में डा रामानंद दास,मणिराम दास छावनी में राधेश्याम शास्त्री,हिंदू धाम में ब्रह्मर्षि डॉ रामविलास दास वेदांती जी के श्रीमुख से हो रही रामकथा की अमृत वर्षा
अयोध्या। नौ दिवसीय रामनवमी मेले के चौथे दिन रामनगरी के दर्जनों मंदिरों में चल रही रामकथाओं में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ गई है। मेले में शामिल होने आए श्रद्धालु मंदिरों में दर्शन-पूजन व सांस्कृतिक-धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेने के क्रम में कथाओं में पूरे मनोयोग से शामिल हो रहे हैं। चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ जी के राजमहल बड़ा स्थान में बिंदुगाद्याचार्य स्वामी देवेन्द्र प्रसादाचार्य जी महाराज के अध्यक्षता में रामजन्म महोत्सव बड़े ही श्रद्धा भाव के साथ मनाया जा रहा है। जिसमें व्यासपीठ से रामकथा की अमृत वर्षा डा रामानंद दास जी कर रहे है।इस पूरे आयोजन का दिव्य संयोजन मंगल भवन पीठाधीश्वर महंत कृपालु रामभूषण दास जी कर रहे है। बिंदुगाद्याचार्य स्वामी देवेन्द्र प्रसादाचार्य जी महाराज ने कहा कि श्रीराम धर्म के विग्रह हैं। वे जो करते हैं, कराते हैं अर्थात उनका पूरा जीवन व उसकी क्रियाएं साक्षात धर्म ही हैं। उन्होंने कहा कि धरा धाम से सबसे लंबा अवतार श्रीराम का रहा। उनके जीवन का एक-एक पल आदर्श व मर्यादा का अद्भुत समन्वय है।
मणिराम दास छावनी में प्रख्यात कथावाचक राधेश्याम शास्त्री जी कथा के क्रम को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा जब भक्त के पास धैर्य की धीरता व संयम का साहस हो तो सुख व आनंद स्वयं पास आ जाते हैं और परीक्षा की घड़ी समाप्त हो जाती है। विपत्ति में भी जो अपने धैर्य का त्याग न करे वह धीर पुरुष कहा जाता है। उन्होंने कहा कि धीरता आत्मा का गुण है। उन्होंने कहा कि शूरता शरीर का, धीरता आत्मा का व वीरता मन के बल हैं। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम धीरशाली हैं और वे प्रजा के हित को ही अपना हित मानते हैं। बुद्धिमान, मतिमान एवं प्रतिभावान इन तीनों में श्री राघवेंद्र सरकार पारंगत हैं। उन्होंने कहा कि श्रीराम सर्वप्रिय हैं। उनके धैर्य, साहस, संयम, त्याग व प्रेम का हर किसी ने सम्मान किया। हिंदू धाम में व्यासपीठ से कथा का महत्त्व बताते हुए पूज्य ब्रह्मर्षि डॉ रामविलास दास वेदांती जी ने कहा कि परमात्मा से सतत संबंध होने पर जीव काल व समय के प्रभाव से मुक्त हो जाता है। इसी रहस्य के बल पर मुनियों ने जंगलों में काल को वश में कर हजारों वर्षो तक तप किया। अयोध्या के सूर्यवंशी राजा ने जीवन के दो पल में एक मे अपना राज्य पुत्र को सौंप दिया व दूसरे पल में वे ईश्वर में ध्यानस्थ हो मुक्त हो गए। उन्होंने कहा कि काल सदैव सतर्क है पर जो प्रभु की शरण में आ जाता है उसे काल का भय नहीं रहता। हमारे संतों ने ऐसा करके ही इच्छामृत्यु का गौरव बार-बार हासिल किया।महोत्सव का संयोजन महंत राघवेश दास वेदांती जी कर रहें।
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