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: खड़ेश्वरी महाराज विलक्षण प्रतिभा के धनी संत रहे:महंत रामप्रकाश दास

बमबम यादव

Mon, Mar 18, 2024

रघुवंश संकल्प सेवा ट्रस्ट अध्यक्ष स्वामी दिलीप दास त्यागी महाराज ने आए हुए संत-महंताें का स्वागत-सत्कार किया

अयाेध्या। रामनगरी की प्रसिद्ध पीठ श्रीरामवैदेही खड़ेश्वरी मंदिर नयाघाट के पूर्वाचार्य महंत भगवान दास खड़ेश्वरी महाराज काे पुण्यतिथि पर संताें ने शिद्दत से याद किया। मंदिर में स्थापित उनकी प्रतिमा पर संत-महंताें द्वारा श्रद्धासुमन अर्पित कर नमन किया गया। अयाेध्याधाम के विशिष्ट संत-महंताें ने साकेतवासी महंत के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। रविवार की सुबह सर्वप्रथम मंदिर में स्थापित श्रीराम वैदेही जू का पंचामृत, फलाें का रस और सुगंधित औषधियों से अभिषेक-पूजन किया गया। तदुपरांत उन्हें नवीन वस्त्र धारण कराकर भव्य श्रृंगार हुआ। उसके बाद भगवान श्रीराम वैदेही सरकार को छप्पन भाेग लगाकर पूजन-अर्चन, आरती किया गया। तत्पश्चात मठ के पूर्वाचार्यों की आरती उतारी गई। फिर बड़ी संख्या में संत-महंत, भक्तगणों ने प्रसाद ग्रहण किया। अंत में श्रीरामवैदेही खड़ेश्वरी मंदिर पीठाधीश्वर महंत रामप्रकाश दास और रघुवंश संकल्प सेवा ट्रस्ट अध्यक्ष स्वामी दिलीप दास त्यागी महाराज ने आए हुए संत-महंताें का स्वागत-सत्कार किया। खड़ेश्वरी मंदिर पीठाधिपति महंत रामप्रकाश दास महाराज ने बताया कि फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि काे मठ में दाे कार्यक्रम पड़ता है। पहला मंदिर में विराजमान भगवान श्रीराम वैदेही जू के वार्षिकोत्सव और दूसरा कार्यक्रम पूर्वाचार्य महंत भगवान दास खड़ेश्वरी महाराज के पुण्यतिथि महाेत्सव का। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी तिथि के अनुसार यह दाेनाें कार्यक्रम आश्रम में श्रद्धापूर्वक मनाया गया।उन्हाेंने कहा कि गुरूदेव भगवान दास खड़ेश्वरी महाराज विलक्षण प्रतिभा के धनी संत रहे। वह त्याग, तपस्या और वैराग्य की प्रतिमूर्ति थे। संतत्व ताे उनमें देखते ही झलकता था। वह गाै और संत सेवी रहे। उन्हाेंने मठ का सर्वांगीण विकास किया। जब वह अयोध्या आए। ताे मां सरयू की गोद में एक छोटी सी झोपड़ी डालकर एक पैर पर दिन-रात खड़े होकर कई वर्षों तक तपस्या किया। उस समय सरयू मैया की धारा श्रीराम वैदेही मंदिर के गेट को छूकर बहती थी। उनकी पूजा-आराधना से ऐसी शक्ति प्राप्त थी कि जो कोई इस मंदिर पर जाकर अपना अपील करता था। ताे उसके काम जल्द पूरा हो जाते थे। वह प्रतिदिन बंदरों, गौ, पंछियों, संताें की सेवा किया करते रहे। गुरूदेव समय-समय पर पशु-पक्षी और जानवरों की आवाज में बोली बोलकर अपने स्थान पर बुला लेते थे। वह अपने स्थान से कहीं जाते नही रहे। 2003 में उनका शरीर छूटने के बाद उनके शिष्य रामप्रकाश दास को सर्वसम्मत से श्रीराम वैदेही मंदिर का महंत बनाया गया। तब से आज तक वह गुरुदेव के बताए मार्ग पर चलकर निरंतर मठ का विकास करते चले आ रहे हैं। आश्रम निरंतर उन्नति के पथ पर अग्रसर है। जहां सभी उत्सव, समैया, त्याैहार परंपरागत रूप से हर्षोल्लास पूर्वक मनाया जा रहा है। इस अवसर पर रघुवंश संकल्प सेवा ट्रस्ट के अध्यक्ष स्वामी दिलीप दास त्यागी, महंत माधवदास रामायणी, महंत रामबालक दास, महंत तुलसीदास नव्यन्यायाचार्य, महंत सीताराम दास, आचार्य नारायण मिश्र, आचार्य वरूण दास, स्वामी दिवाकराचार्य, आचार्य नीरज शास्त्री, नंदकुमार मिश्र, रामरतन आदि उपस्थित रहे।

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