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: श्रीहनुमान जी की आराधना से सद्ज्ञान की प्राप्ति होती है: रत्नेशप्रपन्नाचार्य

बमबम यादव

Mon, Oct 28, 2024
श्रीहनुमान जी की आराधना से सद्ज्ञान की प्राप्ति होती है: रत्नेशप्रपन्नाचार्य सरायराशी में श्रीहनुमज्जयन्ती के अवसर पर हो रही हनुमत कथा अयोध्या। मानव जीवन हमें बहुत शुभ कर्मों से प्राप्त हुआ है, जिसे हमें व्यर्थ नहीं गंवाना है। जीवन का मूल उद्देश्य परमात्मा को पाना है और इसके लिए सत्संग के माध्यम से सदमार्ग पर चलना होगा। हम जैसा कर्म करेंगे हमें फल भी वैसा ही प्राप्त होगा। उक्त बातें सरायराशी,अयोध्या में श्रीहनुमज्जयन्ती के पावन अवसर पर हनुमत कथा के द्वितीय-दिवस में जगद्गुरु रत्नेशप्रपन्नाचार्य ने कही। उन्होंने कहा कि जब शुभ कर्मों की फसल कटती है तो सुख-शांति और प्रसन्नता का हमारे घर में आगमन होता है और जब बुरे कर्मों की फसल कटती है तो हमारे घर में दुःख आते हैं। हर मनुष्य को सदा अपने कर्त्तव्य का पालन करना चाहिए। उसके शुभ-अशुभ सभी प्रकार के कर्म ही खेत में पड़े बीज की तरह अंकुरित होकर उचित समय पर फल देते हैं।जगद्गुरू जी ने कहा कि किसी भी प्रकार का कर्म कभी भी फल दिए बिना नहीं रहता। बीज जिस जाति का होता है उस जाति का फल देना उसका स्वभाव होता है, इसलिए अपने कर्म करने में मनुष्य को सदा सावधान रहना चाहिए। शुभ कर्म का फल है - सत्संग। सत्संग जीवन का अमृत है। सत्संग के बिना जीवन नीरस हो जाता है। शरीर आज है, कल नहीं रहेगा। परन्तु, आत्मा अमर है शाश्वत है। आचार्य जी ने कहा कि श्रीहनुमान जी की आराधना से सद्ज्ञान की प्राप्ति होती है। मनुष्य शारीरिक रूप से स्वस्थ दिखता है, लेकिन मानसिक रूप से वह स्वस्थ है यह कहना कठिन है। मानसिक रोग हनुमान जी ही ठीक करते हैं। संसार ही एक रोग है, इस सांसारिकता के बंधन से हनुमान जी ही मुक्ति दिलाते हैं। अर्थात्, "नासै रोग हरे सब पीरा ..."। वेद कहते हैं कि सभी दु:खों की जड़ अज्ञानता है और जो हनुमान जी की उपासना करते हैं उन्हें सद्ज्ञान की प्राप्ति होती है। रत्नेशप्रपन्नाचार्य ने कहा कि जितनी सिद्धियां हैं, वे श्रीहनुमान जी की कृपा से ही मिलती हैं। मनुष्य विचारशील प्राणी है, इसलिए उसे चिंतन-मनन करना चाहिए। इस प्रकृति के अन्य प्राणियों में कोई न्यूनता नहीं है। उन्होंने कहा कि हमारे अंदर विचारों और संकल्पों का बहुत शोर है। हम स्वयं को नहीं जानते, स्वयं को नहीं खोजना चाहते और यह दोष लगातार हम सबमें बढ़ता जा रहा है। हमने शास्त्रों और गुरूओं का आदर करना छोड़ दिया है। सिर पर आंचल भी अब बोझ लगने लगा है। जड़ से अलग होकर कोई भी वृक्ष फल-फूल नहीं सकता। जीवन में स्वतंत्रता के साथ अनुशासन भी आवश्यक है। हमारा व्यवहार और चिंतन भी बदलता है। इसलिए अनुशासन कठोर तो है, कठिन भी है, पर उसका परिणाम सुखद है। इस मौके पर बड़ी संख्या में कथा प्रेमी मौजूद रहें।

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