: संतों के चरणों में समस्त तीर्थों का निवास होता है: पुण्डरीक गोस्वामी
बमबम यादव
Sun, Jan 28, 2024
कहा, संत-महात्माओं का आगमन सदैव मंगलकारी होता है, संतों से कभी कार्य की हानि नहीं होती, अपितु उनसे कार्य की सिद्धि होती है

श्री मन्माधव गौड़ेश्वर वैष्णव आचार्य पुण्डरीक गोस्वामी जी व उदासीन ऋषि आश्रम के श्रीमहंत डा भरत दास सहित सौकड़ों संत साधकों ने हरे रामा रहे कृष्णा के धुन पर नाचते गाते की रामकोट की परिक्रमा

श्री राम लला सरकार की प्राण प्रतिष्ठा के उपलक्ष्य में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा तृतीय सांस्कृतिक संध्या सत्र में निमाई पाठशाला द्वारा किया गया भाव प्रस्तुति

अयोध्या। उदासीन संगत ऋषि आश्रम रानोपाली में श्री राम लला सरकार की प्राण प्रतिष्ठा के उपलक्ष्य में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा का उल्लास अपने चरम पर है। आश्रम में सुबह से लेकर देरशाम तक उत्सव का क्रम चल रहा है। उदासीन आश्रम की सुबह रामचरित मानस के पाठ से तो शाम सांस्कृतिक संध्या से हो रहा है। श्रीमद् भागवत कथा की दिव्य भव्य रसमयी कथा वृंदावन धाम के भगवान राधारमण सरकार के परमभक्त श्री मन्माधव गौड़ेश्वर वैष्णव आचार्य पुण्डरीक गोस्वामी जी कर रहें है।चतुर्थ दिन की कथा में पुण्डरीक गोस्वामी जी ने कहा कि संत-महात्माओं का आगमन सदैव मंगलकारी होता है, संतों से कभी कार्य की हानि नहीं होती, अपितु उनसे कार्य की सिद्धि होती है। उन्होंने कहा कि संतों के चरणों में समस्त तीर्थों का निवास होता है, क्योंकि संत के चरण तीर्थों में घूमते-रहते हैं, वो सभी जगह जाते हैं, इसलिए जब कभी भी संत आएं तो उनके चरणों को धो लेना चाहिए, क्योंकि उनके चरणों में सारे तीर्थों का स्पर्श पहले से ही विद्यमान रहता है। इसीलिए संतों को तीर्थंकर कहा जाता है। आचार्य जी ने कहा कि तीर्थ तभी तीर्थ बनता है जब वहां संतों के चरण पड़ जाते हैं, अगर तीर्थों में संत ना जाएं, केवल सामान्य लोग ही जाएं तो वो तीर्थ, तीर्थ नहीं होता। भागवत में गंगाजी की महिमा का वर्णन है, जिसमें गंगाजी कहती हैं मेरे अंदर बडे़-बड़े संत महात्माओं के डुबकी लगाने से लाखों लोगों को पवित्र करने का सामर्थ्य पैदा हो जाता है। इसीलिए आज भी कुंभ में संत-महात्माओं पहले शाही स्नान इसलिए करते हैं, ताकि संतो के नहाने से उस गंगा में लाखों लोगों को पवित्र करने का सामर्थ्य पैदा हो जाए। ये भागवत शास्त्र में लिखा प्रमाण है। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में वर्णित है कि जिसके घर के दरवाजे पर संतों के चरण नहीं धोये जाते हों और संतों के चरण के धोने से वहां की जमीन ना भीगती हो, द्वार पर संतों का चरण प्रक्षालन नहीं होता है वो घर शमशान के समान है। संत महात्मा और विद्वान पुरूषों का सबसे बड़ा सम्मान विनम्रतापूर्वक उनको प्रमाण करना ही उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान है। प्रमाण से बड़ा कोई सम्मान नहीं होता। लेकिन वो प्रणाम बनावटी नहीं यथार्थ हो। नमस्कार पद की न्याय शास्त्र में व्याख्या है कि जिसको हम प्रणाम कर रहे हैं उसके सामने मेरा अपकर्ष और जिसको प्रणाम कर रहे हैं उसका उत्कर्ष। हमारी गतिविधि, क्रिया के द्वारा परिलक्षित हो। उसका नाम नमस्कार है। ये नमस्कार प्रणाम ये अंजली मुद्रा इतनी अद्भुत मुद्रा है, जिसके लिए शास्त्रो में कहा गया है कि ये मुद्रा ऐसी विलक्षण मुद्रा है कि एक क्षण में देवता को प्रसन्न कर देती है, लेकिन वो सच्चे मन से हो। आचार्य पुण्डरीक जी ने कहा कि वास्तविक स्वरूप को लोग समझें, वैदिक विद्वान जब बैठकर वेदध्वनि व पुराण का पारायण करते हैं, भगवान का मंत्रों द्वारा हवन होता है, एक दिव्य संदेश पूरी दुनिया को सनातन का संदेश जाता है। पूरे विश्व में सनातन धर्म एक धर्म ऐसा है जो अपने लिए नहीं जीता, बल्कि सारे विश्व के प्राणी मात्र की कल्याण की कामना करता है। ऐसा विस्तृत व व्यापक धर्म दुनिया में कहीं नहीं है। हम जितनी भी क्रिया करते हैं वा जग के कल्याण के लिए करते हैं। तो वही सांस्कृतिक संध्या में निमाई पाठशाला द्वारा बड़ा ही सुंदर भाव प्रस्तुति किया गया जिसमें भगवान श्रीकृष्ण की सुंदर प्रस्तुति ने सभी का दिल जीत लिया और मौजूद संत साधक भावुक हो गये। आचार्य पुण्डरीक जी के संयोजन व श्रीमहंत डा भरत दास जी की अध्यक्षता में हरे रामा हरे कृष्णा के मनोहारी ध्वनि पर ढोल नगाड़ों के साथ नाचते गाते सौकड़ों भक्तों ने रामकोट की परिक्रमा करते भगवान रामलला के दर्शन किये। कथा से पूर्व व्यासपीठ का पूजन डा राम गर्ग, मिनी गर्ग ने किया। इस मौके पर आचार्य पीठ श्री लक्ष्मण किला के श्रीमहंत मैथली रमण शरण, रिटायर्ड आईपीएस विजयपाल सिंह, आईपीएस एस एन सिंह,जिले के प्रसिद्ध ठेकेदार समाजसेवी आईपी सिंह, एसपी सिंह, कन्नौज के नेता प्रदीप यादव सहित बड़ी संख्या में संत साधक व आचार्य पुण्डरीक गोस्वामी जी के शिष्य परिकर मौजूद रहें।
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