Thursday 5th of November 2026

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धनुष यज्ञ में श्रीराम ने तोड़ा शिवधनुष, परशुराम-लक्ष्मण संवाद ने बांधा : भगवताचार्य स्मारक सदन की पौराणिक रामलीला के चतुर्थ दिवस भावपूर्ण मंचन, जयकारों से गूंजा रामलीला परिसर

धनुष यज्ञ में श्रीराम ने तोड़ा शिवधनुष, परशुराम-लक्ष्मण संवाद ने बांधा समां

भगवताचार्य स्मारक सदन की पौराणिक रामलीला के चतुर्थ दिवस भावपूर्ण मंचन, जयकारों से गूंजा रामलीला परिसर

अयोध्या। रामनगरी के भगवताचार्य स्मारक सदन में आयोजित पौराणिक एवं ऐतिहासिक श्रीरामलीला के चतुर्थ दिवस धनुष यज्ञ तथा परशुराम-लक्ष्मण संवाद की लीला का भावपूर्ण मंचन किया गया। प्रभु श्रीराम के पराक्रम, माता सीता के स्वयंवर और भगवान परशुराम के तेजस्वी स्वरूप पर आधारित प्रसंगों ने दर्शकों को रामकथा की आध्यात्मिक भावधारा से जोड़ दिया। लीला के दौरान श्रद्धालु जय श्रीराम के जयकारे लगाते रहे और पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण में डूबा रहा।

रामलीला के प्रसंगानुसार, राजा जनक की प्रतिज्ञा के तहत आयोजित सीता स्वयंवर में देश-देशांतर से आए राजा और महाराजा भगवान शिव के विशाल धनुष को उठाने और उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास करते हैं, लेकिन सभी असफल रहते हैं। राजाओं की विफलता से राजा जनक चिंतित हो उठते हैं। इसके बाद गुरु विश्वामित्र की आज्ञा पाकर प्रभु श्रीराम आगे बढ़ते हैं। श्रीराम सहज भाव से शिवधनुष उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाते हैं और धनुष टूट जाता है। धनुष टूटने की गूंज के साथ ही स्वयंवर स्थल हर्षोल्लास और जयकारों से गूंज उठता है। माता सीता श्रीराम के गले में वरमाला डालती हैं और श्रद्धालु इस दिव्य प्रसंग के साक्षी बनते हैं।

धनुष टूटने का समाचार सुनकर भगवान परशुराम क्रोधित होकर जनक दरबार पहुंचते हैं। शिवधनुष को खंडित देखकर उनका आक्रोश बढ़ जाता है। इसी दौरान परशुराम और लक्ष्मण के बीच तीखा संवाद होता है। लक्ष्मण अपने चिरपरिचित व्यंग्यपूर्ण अंदाज में परशुराम के क्रोध का प्रत्युत्तर देते हैं, जबकि परशुराम अपने तप, तेज और पराक्रम का परिचय देते हैं। दोनों के बीच हुए संवाद ने रामलीला में वीर रस और हास्य का अनूठा समन्वय प्रस्तुत किया। वहीं, प्रभु श्रीराम अपने विनम्र और मर्यादित व्यवहार से स्थिति को शांत करने का प्रयास करते हैं।

पत्थर मंदिर की पौराणिक व ऐतिहासिक अवध आदर्श रामलीला मंडल के कलाकारों के प्रभावशाली अभिनय, सजीव संवाद और पारंपरिक मंचन ने दर्शकों को देर तक बांधे रखा। रामलीला का यह प्रसंग मर्यादा, विनम्रता, वीरता और धर्म के मूल्यों का संदेश देता है। आयोजन के माध्यम से श्रद्धालुओं को भगवान श्रीराम के आदर्शों और रामकथा की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर मिला।इस पावन अवसर पर निर्वाणी अनी के श्रीमहंत मुरली दास महाराज, श्री तुलसीदास रामलीला समिति के कोषाध्यक्ष एवं बड़ा भक्तमाल पीठाधीश्वर श्रीमहंत अवधेश कुमार दास महाराज, महामंत्री महंत संजय दास महाराज, श्रृंगी ऋषि पीठाधीश्वर महंत हेमंत दास महाराज, महंत रामकुमार दास महाराज, महंत शशिकांत दास महाराज, महंत धनुषधारी शुक्ला, बाबा विराट दास, पुजारी राम आशीष दास, घनश्याम दास, तन्मय दास, शशि दास एवं सचिव शिवम श्रीवास्तव सहित बड़ी संख्या में पूज्य संत-महंत एवं श्रद्धालुजन उपस्थित रहे।रामलीला के चतुर्थ दिवस धनुष यज्ञ तथा परशुराम-लक्ष्मण संवाद की लीलाओं ने श्रद्धालुओं को रामकथा की भावभूमि से जोड़ते हुए अयोध्या की समृद्ध धार्मिक विरासत की झलक प्रस्तुत की।

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