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: सिखों के छठवे गुरु श्री गुरु हर गोविंद सिंह जी की जयंती विशेष

बमबम यादव

Thu, Jun 19, 2025
सिखों के छठवे गुरु श्री गुरु हर गोविंद सिंह जी की जयंती विशेष
"गुरु हरगोविंद सिंह जी केवल एक धार्मिक गुरु ही नहीं थे, वे सच्चे अर्थों में समाज सुधारक, योद्धा और दयालु हृदय के स्वामी थे" गुरु ने बताया कि आध्यात्मिक जीवन जीने के साथ-साथ अन्याय का विरोध करना भी धर्म है गुरुद्धारा नजरबाग में जत्थेदार बाबा महेन्द्र सिंह जी के पावन सानिध्य में  25 जून को जयंती उत्सव मनाई जाएगी नवनीत सिंह, सेवादार ऐतिहासिक गुरुद्वारा नजरबाग,अयोध्या धाम ने छठवे गुरु श्री गुरु हर गोविंद सिंह जी की जयंती विशेष पर क्या कहा... सिखों के छठवे गुरु, गुरु हर गोविंद सिंह जी का जन्म बडाली (अमृतसर, भारत) में हुआ था। वे सिखों के पांचवें गुरु अर्जुन सिंह के पुत्र थे। उनकी माता का नाम गंगा था। इस वर्ष गुरुद्धारा नजरबाग में 25 जून बुधवार को  श्री गुरु हर गोविंद सिंह महाराज का प्रकाश पर्व मनाया जाएगा। इस अवसर पर गुरुद्वारा में कीर्तन दरबार, अखंड पाठ के साथ-साथ अटूट लंगर का आयोजन भी किया जाता है। उन्होंने अपना ज्यादातर समय युद्ध प्रशिक्षण एवं युद्ध कला में लगाया तथा बाद में वे कुशल तलवारबाज, कुश्ती व घुड़सवारी में माहिर हो गए। उन्होंने ही सिखों को अस्त्र-शस्त्र का प्रशिक्षण लेने के लिए प्रेरित किया व सिख पंथ को योद्धा चरित्र प्रदान किया। गुरु हर गोविंद एक परोपकारी एवं क्रांतिकारी योद्धा थे। उनका जीवन-दर्शन जन-साधारण के कल्याण से जुड़ा हुआ था। गुरु हर गोविंद सिंह ने अकाल तख्त का निर्माण किया था। मीरी पीरी तथा कीरतपुर साहिब की स्थापनाएं की थीं। उन्होंने रोहिला की लड़ाई, कीरतपुर की लड़ाई, हरगोविंदपुर, करतारपुर, गुरुसर तथा अमृतसर- इन लड़ाइयों में प्रमुखता से भागीदारी निभाई थी। वे युद्ध में शामिल होने वाले पहले गुरु थे। उन्होंने सिखों को युद्ध कलाएं सिखाने तथा सैन्य परीक्षण के लिए भी प्रेरित किया था। हर गोविंद जी ने मुगलों के अत्याचारों से पीड़ित अनुयायियों में इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास पैदा किया। मुगलों के विरोध में गुरु हर गोविंद सिंह ने अपनी सेना संगठित की और अपने शहरों की किलेबंदी की। उन्होंने 'अकाल बुंगे' की स्थापना की। 'बुंगे' का अर्थ होता है एक बड़ा भवन जिसके ऊपर गुंबज हो। उन्होंने अमृतसर में अकाल तख्त (ईश्वर का सिंहासन, स्वर्ण मंदिर के सम्मुख) का निर्माण किया। इसी भवन में अकालियों की गुप्त गोष्ठियां होने लगीं। इनमें जो निर्णय होते थे उन्हें 'गुरुमतां' अर्थात् 'गुरु का आदेश' नाम दिया गया। इस कालावधि में उन्होंने अमृतसर के निकट एक किला बनवाया तथा उसका नाम लौहगढ़ रखा। दिनोंदिन सिखों की मजबूत होती स्थिति को खतरा मानकर मुगल बादशाह जहांगीर ने उनको ग्वालियर में कैद कर लिया। गुरु हर गोविंद 12 वर्षों तक कैद में रहे, इस दौरान उनके प्रति सिखों की आस्था और अधिक मजबूत होती गई। वे लगातार मुगलों से लोहा लेते रहे। रिहा होने पर उन्होंने शाहजहां के खिलाफ बगावत कर दी और संग्राम में शाही फौज को हरा दिया। अंत में उन्होंने कश्मीर के पहाड़ों में शरण ली, जहां सन् 1644 ई. में कीरतपुर (पंजाब) में उनकी मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु से ठीक पहले गुरु हर गोविंद ने अपने पोते गुरु हरराय को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। सिख समुदाय में छठवे गुरु, गुरु हर गोविंद साहिब जी का प्रकाश पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। गुरुद्धारा नजरबाग के सेवादार नवनीत सिंह ने कहा कि हमारे गुरुद्धारा नजरबाग में जत्थेदार बाबा महेन्द्र सिंह जी के पावन सानिध्य में गुरु जी की जयंती 25जून को मनाई जायेगी।

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